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Sunday, 07 June 2026 | New Delhi

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श्रीमदपद्मपुराण के अनुसार देवशयनी एकादशी का माहात्म्य

आषाढ़ मास की कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी का माहात्म्य जानने के बाद

युधिष्ठिर ने पूछा – भगवन्‌ ! आषाढ़ के शुक्लपक्ष में कौन-सी एकादशी होती है ? उसका नाम और विधि क्‍या है ? यह बतलाने की कृपा करें।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले – राजन्‌ ! आषाढ़ शुक्लपक्ष की एकादशी का नाम ‘शयनी’ है। मैं उसका वर्णन करता हूँ। वह महान्‌ पुण्यमयी, स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदान करने वाली, सब पापों को हरने वाली तथा उत्तम व्रत है।

आषाढ़ शुक्लपक्ष में शयनी एकादशी के दिन जिन्होंने कमल पुष्प से कमललोचन भगवान्‌ विष्णु का पूजन तथा एकादशी का उत्तम व्रत किया है, उन्होंने तीनों लोकों और तीनों सनातन देवताओं का पूजन कर लिया।

हरिशयनी एकादशी के दिन मेरा एक स्वरूप राजा बलि के यहाँ रहता है और दूसरा क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर तब तक शयन करता है, जब तक आगामी कार्तिक की एकादशी नहीं आ जाती; अत: आषाढ़ शुक्ल एकादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक मनुष्य को भलीभाँति धर्म का आचरण करना चाहिये।

जो मनुष्य इस व्रत का अनुष्ठान करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है, इस कारण यन्रपूर्वकः इस एकादशी का व्रत करना चाहिये।

एकादशी की रात में जागरण करके शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान्‌ विष्णु की भक्ति-पूर्वक पूजा करनी चाहिये | ऐसा करने वाले पुरुष के पुण्य की गणना करने में चतुर्मुख ब्रह्माजी भी असमर्थ हैं।

राजन्‌ ! जो इस प्रकार भोग और मोक्ष प्रदान करने वाले सर्व-पापहारी एकादशी के उत्तम व्रत का पालन करता है, वह जाति का चाण्डाल होने पर भी संसार में सदा मेरा प्रिय करने वाला है।

जो मनुष्य दीपदान, पलाश के पत्ते पर भोजन और व्रत करते हुए चौमासा व्यतीत करते है, वे मेरे प्रिय है।

चौमासे में भगवान् विष्णु सोये रहते है। इसलिए मनुष्य को भूमि पर शयन करना चाहिये | सावन में साग, भादों में दही, कवार में दूध और कार्तिक में दाल का त्याग कर देना चाहिये । अथवा जो चौमासे में ब्रह्मचर्य का पालन करता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

राजन्‌ ! शयनी एकादशी के व्रत से ही मनुष्य सब पापों से मुक्त हो जाता है; अतः सदा इसका व्रत करना चाहिये।

कभी भूलना नहीं चाहिये |

देवशयनी एकादशी और देवउठनी एकादशी के बीच में जो कृष्णपक्ष की एकादशियाँ होती हैं, गृहस्थ के लिये वे ही व्रत रखने योग्य हैं। अन्य मासों की कृष्णपक्षीय एकादशी गृहस्थ के रखने योग्य नहीं होती | शुक्ल-पक्ष की एकादशी सभी करनी चाहिये।

जाने अगली एकादशी अर्थात श्रावण मास के कृष्णपक्ष में कौन-सी एकादशी होती है, इसे शयन एकादशी, Shayan Ekadashi, Sayan Ekadashi, Shayana Ekadashi, भी कहते है।


स्रोत – श्रीमदपद्मपुराण, श्री गीताप्रेस, पृष्ठ संख्या – 666
अध्याय – उत्तरखंड – आषाढ़ मास की ‘योगिनी’ और ‘शयनी’ एकादशी का माहात्म्य


FAQs –

देवशयनी एकादशी 2025 में कब है?

Shayan Ekadashi – 9th July 2025

चातुर्मास व्रत के क्या नियम हैं?

चातुर्मास के नियम –

चौमासे में भगवान विष्णु के शयन काल में मनुष्य को इन नियमों का पालन करना चाहिए:

  • भूमि पर शयन करना चाहिए।
  • सावन में: साग का त्याग करें।
  • भादों में: दही का त्याग करें।
  • क्वार (आश्विन) में: दूध का त्याग करें।
  • कार्तिक में: दाल का त्याग करें।
  •  

    ब्रह्मचर्य का पालन करें।

चातुर्मास कब से कब तक होता है?

हिन्दू पंचांग के अनुसार, चातुर्मास की अवधि चार महीने की होती है। इसकी शुरुआत देवशयनी एकादशी से होती है और इसका समापन देवउठनी एकादशी पर होता है।

2025 में चातुर्मास की तिथियाँ इस प्रकार हैं –

प्रारंभ: 6 जुलाई 2025, रविवार (देवशयनी एकादशी)

समापन: 1 नवंबर 2025, शनिवार (देवउठनी एकादशी)

इस चार महीने की अवधि में कोई भी शुभ या मांगलिक कार्य जैसे विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन आदि नहीं किए जाते हैं।

देवशयनी एकादशी का व्रत क्यों महत्वपूर्ण है?

देवशयनी एकादशी का व्रत हिंदू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं –

भगवान विष्णु का शयन काल – देवशयनी एकादशी के दिन से भगवान विष्णु चार महीनों के लिए क्षीर सागर में योग निद्रा में चले जाते हैं। इसी के साथ चातुर्मास की शुरुआत होती है। भगवान विष्णु के शयन काल में चले जाने के कारण इस दौरान कोई भी मांगलिक कार्य नहीं किए जाते।

चातुर्मास की शुरुआत – यह एकादशी चार पवित्र महीनों की शुरुआत का प्रतीक है। यह समय तप, साधना, व्रत, ध्यान और स्वाध्याय के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इस दौरान किए गए धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष फल मिलता है।

पापों से मुक्ति – इस एकादशी का व्रत विधि-विधान से करने पर व्यक्ति के जाने-अनजाने में किए गए सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है।

सृष्टि का संचालन – जब भगवान विष्णु योग निद्रा में होते हैं, तब भगवान शिव सृष्टि के संचालन का उत्तरदायित्व संभालते हैं। इसलिए इस दौरान शिव पूजा का भी विशेष महत्व होता है, खासकर सावन के महीने में।

 

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