विशेष जानकारी – भगवान शिव, श्रीराम के बारे में पौराणिक कथा सुनाते हुए उस समय का वृतांत बताते है, जब श्रीराम ने अपने हाथो से श्री रामेश्वर लिंग की स्थापना की थी, वहां शिवजी ने स्वयं प्रकट होकर श्रीराम से बातचीत की थी, वे उस घटना को मां पार्वती को सुना रहे है।
12 ज्योतिर्लिंग का उत्पत्ति - हे देवि ! उस समय बालू के लिंग में से प्रकट होकर मेने राम से जो कुछ कहां था, वह सब तुमको सुनाता हूँ। ध्यान देकर सुनो।
महादेव ने स्वयं की 12 ज्योतिर्लिंग का उत्पत्ति – हे देवि ! उस समय बालू के लिंग में से प्रकट होकर मेने राम से जो कुछ कहां था, वह सब तुमको सुनाता हूँ। ध्यान देकर सुनो।
मैंने कहा – हे राघवेंद्र! हे रघुश्रेष्ठ! तुम्हें में एक प्राचीन इतिहास सुनाता हूँ।
एक समय कौतुकवश मैं पुराने कपड़े पहिन तथा ब्राह्मण का रूप धरकर आनन्द से भिक्षा के लिए पृथ्वी पर विचर रहा था। इस प्रकार ऋषियों के आश्रम में घूमता हुआ मुझे देखकर सैकड़ो ऋषि पत्नियाँ मेरे रूप पर मोहित हो गयीं। पतियों के रोकने पर भी वे नहीं रुकी और मेरे पीछे घूमने लगी। तब वे सब मुनिवर मुझे न पहिचानकर बहुत चकराए और क्रुद्ध होकर उन्होंने मुझे बड़ा भयानक शाप दे दिया।
उन्होने कहा – अरे! अधम ब्राह्मण ! लगता है, तूने रति करने के लिए हमारी स्त्रियों को मोहित कर लिया है। इससे तेरे रति का साधन अर्थात् लिंग हमारे कहने से कटकर जमीन पर गिर पड़े।
हे राम !उनके शाप से द्विजवेशधारी मेरा लिंग कटकर तुरन्त जमीन पर गिर पड़ा। बाद में, मैं अंतर्ध्यान हो गया। मुझे न देखकर वे द्विज स्त्रियाँ भी अपने-अपने घर चली गयी।
तदनन्तर वह लिंग इस प्रकार बढ़ा कि आकाश तक व्याप्त हो गया। यह देखकर ब्रह्मा बहुत चकित हुए और उसका अन्त देखने के लिए उद्यत हो गये । करोड़ो वर्षों तक पता लगाने पर भी ब्रह्मा को जब मेरे लिंग का अन्त नहीं मिला, तथा मेरे पास आकर डरते हुए उन्होंने कहा – हे शम्भू! इससे तो अकाल में ही प्रलय होना चाहता है।
मैने ब्रह्मा को पूव॑ वृत्तांत सुनाकर सादर उनके हाथ में उस लिंग को काटने के लिए अपना त्रिशूल दे दिया। तब ब्रह्मा ने कहा – मै भला आपके अंग को कैसे काट सकता हूँ। आप इस काटे।
हे राघव ! तब मेने उस लिंग के बारह टुकड़े कर डाले। फिर त्रिशूल से ही उठाकर उनको पृथ्वी पर इधर उधर फेक दिया। वे ही बारहों टुकड़े यहाँ पर बारह ज्योतिर्लिंग के नाम से विख्यात हुए।
ओंकारनाथ (Omkareshwar Jyotirlinga)
सोमनाथ (Somnath Jyotirlinga)
त्र्यम्बकेश्वर (Trimbakeshwar Jyotirlinga)
मल्लिकार्जुन (Mallikarjuna Jyotirlinga)
नागेश्वर (Nageshwar Jyotirlinga)
वैद्यनाथ (Baidyanath Jyotirlinga)
काशी विश्वनाथ (Kashi Vishwanath Jyotirlinga)
केदारनाथ (Kedarnath Jyotirlinga )
केदारेश्वर (Kedareshwar Jyotirlinga) – (Kedareshwar Cave, महाराष्ट्र में है, हिंदी अर्थ में यहाँ आनंदरामायण में शिव जी ने स्वयं उसे ज्योतिर्लिंग बताया है। लेकिन संस्कृत में इसे भीमेशु अर्थात भीम के ईश ही कहा गया है। )
बारहवाँ लिंग, गंधमादन पर्वत के ईशान कोण वाले शिखर पर बहुत काल तक स्थित रहकर भी किसी मनुष्य की दृष्टि में नहीं आया। तब मुनियों ने लिंग के द्वारा शिव कों पहिचानकर पुनः वर दिया – हे! गिरिजाप्रिय ! तुम्हारे फिर लिंग हो जाये।
तदनन्तर एक समय वह मेरु का गंधमादन नामक उत्तरी शिखर प्रलय वायु से उड़कर यहाँ आा गिरा। हे राघव ! उस गंधमादन शिखर को तुम यहाँ दक्षिणी समुद्र के संगम पर जल में देख सकते हो। बारहवां गंधमादन लिंग तुम्हारे प्रतिष्ठित लिंग की ईशान दिशा में पास ही विद्यमान है। इतने समय तक इसको किसी ने नहीं देखा था। पर आज वानर सहित तुमने इस मोक्षप्रद लिग कों स्पष्ट देख लिया है। तुम्हारे द्वारा स्थापित लिंग की महिमा से ही पृथ्वी पर इसकी प्रसिद्दि हुई है। इस कारण हे रघूत्तम ! इस लिंग की जो ज्योति है, वह ज्योति तुम्हारे द्वारा स्थापित बालुकामय लिंग में मेरे कहने से आज ही चली आएगी।
हे रघूत्तम ! आज से बारहवाँ ज्योतिर्लिंग तुम्हारा स्थपित रामेश्वर ही दुनियां के सब मनुष्यो में प्रसिद्ध होगा। मेरे वचन से पूजा आदि सब उपचार सदा तुम्हारे रामेश्वर लिंग का ही होगा। मैं भी अगस्त्य मुनि के तथा तुम्हारे कहने से काशी छोड़कर यहाँ आ गया हूँ और अब तुम्हारे इस लिंग में ही निवास करूँगा। जो मनुष्य सेतुवंध रामेश्वर कों प्रणाम करेगा, वह मेरी कृपा से ब्रह्महत्या आदि भयानक पापों से भी मुक्त हो जायगा।
हे रघुश्रेष्ठ ! आप मुझे यह वर दें कि सब लोग मुझे स्नान कराने के लिए सदा काशी की मणिकरणिका का जल लाकर चढ़ाया करें।
हे पार्वती ! मेरे इस वचन को सुनकर श्रीराम हर्षित होकर बोले कि जो मनुष्य सेतुवंध में स्नान करके रामेश्वर शिव का दर्शन करेंगे, फिर हढ़ संकल्प से सेतुकी बालुका को काँवर में रखकर प्रेम तथा यत्न से काशी में ले जाकर गंगा के प्रवाह में डालेंगे और उस काँवर को वहीं छोड़कर दूसरी काँवर के द्वारा गंगाजल लाकर उससे रामेश्वर का अभिषेक करेंगे। वहाँ उस काँवर कों भी समुद्र में फेंककर नि:संदेह ब्रह्मपद को प्राप्त होंगे। जब तक दृढ़ संकल्प न होगा, तब तक रामेश्वरम आना न होगा।
कदाचित् कोई आ गया तो यही जानना चाहिए कि उसके पूर्वजन्म का संकल्प था। मेरे कहने से आप इस बात में तनिक भी संदेह न करें।
इस प्रकार राम जब अनेक वर दे रहे थे, तभी वहां कुम्भजन्म ऋषि (अगस्त ऋषि) मुनि आ पहुंचे। उन्होंने वहाँ आकर शिव तथा राम को प्रणाम किया।
तब राम ने भी मुनि को प्रणाम किया। अगस्त्य मुनि ने राम से कहा – हे राघव! आपके अनुगृह से मुझे आज बहुत दिन के बाद विश्वनाथ (शिव जी) का दर्शन प्राप्त हुआ है।
इससे मुझे बड़ी प्रसन्नता हो रही है। इसलिए में भी यहाँ एक लिंग स्थापित करता हूँ। इतना कहकर अगस्त्य मुनि ने भी अपने नाम से एक उत्तम लिंग स्थापित किया । मुनि ने आनन्द के साथ रामेश्वर के अग्निकोण में उसकी स्थापना की। इस प्रकार मुनि ने अगरतीश्वर नामक लिंग की पूजा करके विश्वनाथ, रामेश्वर एवं श्रीराम की स्तुति तथा प्रणाम करने के अनन्तर पुरातन गंघमादन लिंग का दर्शन किया और प्रसन्न होकर अपने आश्रम को चले गये।
है देवि ! सेतुवंध रामेश्वर के देवालय में ही आग्नेय कोण में अगस्तीश्वर तथा ईशान कोण में गन्धमादनेश्वर का लिंग अभी भी विद्यमान है। उन्हें कोई इन नामों से जानता है और कोई नहीं भी जानता। लेकिन रामेश्वर का लिंग स्वर्ग, पाताल तथा मृत्यु इन तीनों लोकों में प्रसिद्ध हो गया।
महादेव जी ने यहाँ ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति के बारे में बताया है शिवलिंग की नहीं।
ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति अन्य शास्त्रों में अगर भिन्न प्रतीत होती है तो वह इस कथा का या तो दूसरा अंश होगा या कल्पभेद होगा। अपने विवेक का इस्तेमाल करे।
FAQs (भावानुसार) –
ज्योतिर्लिंग क्या है?
साक्षात् महादेव की शक्ति ही ज्योतिर्लिंग के रूप में विध्यमान है।
ज्योतिर्लिंग का इतिहास क्या है?
श्रीमद आनन्दरामायण के अनुसार ज्योतिर्लिंग का इतिहास ऊपर दिया गया है, लेकिन कल्पभेद के कारण भिन्न भिन्न पुराणों अलग अलग महिमा है।
12 ज्योतिर्लिंग की स्थापना किसने की?
श्रीमद आनन्दरामायण के अनुसार स्वयं महादेव ने 12 ज्योतिर्लिंग की स्थापना की है।
ज्योतिर्लिंग की उत्पत्ति कैसे हुई?
श्रीमदआनन्दरामायण के अनुसार महादेव अपने त्रिशूल से 12 ज्योतिर्लिंग की स्थापना की है।
12 ज्योतिर्लिंग कैसे उत्पन्न हुआ?
आनन्दरामायण के अनुसार महादेव अपने त्रिशूल से 12 ज्योतिर्लिंग की स्थापना की है।
12 ज्योतिर्लिंग के पीछे की कहानी क्या है?
आनन्दरामायण के अनुसार ज्योतिर्लिंग के पीछे की कहानी ऊपर स्वयं महादेव ने पार्वती को बताई है। कल्पभेद के कारण भिन्न-भिन्न पुराणों की अलग-अलग महिमा है।
12 ज्योतिर्लिंग का नाम कैसे पड़ा?
स्वयं महादेव ने इन 12 ज्योतिर्लिंगों का नामकरण किया।
सबसे बड़ा ज्योतिर्लिंग कौन सा है?
मनुष्य की मुक्ति का सीधा मार्ग 12 ज्योतिर्लिंग के दर्शन है। जिसमें रामेश्वरम की बालू को लेकर मणिकर्णिका गंगा घाट में प्रवाहित करना होता है। फिर काशी विश्वनाथ के दर्शन करके अन्य 10 ज्योतिर्लिंग के दर्शन करे। आपको फिर वापस काशी विश्वनाथ आकर उनके दर्शन करके, उनसे अनुमति और जल लेना है और उसे श्री रामेश्वरम पर चढ़ाना है।