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कार्तिक मास द्वादशी तिथि का महात्म्य

The Significance of the Dwadashi Tithi in the Month of Kartik

ब्रह्माजी कहते हैं — जो पुरुष कार्तिक मास में प्रतिदिन पुरुषसूक्त के मन्त्रों द्वारा अथवा पञ्चरात्र आगम में बतायी हुई विधि के अनुसार भगवान् विष्णु का पूजन करता है, वह मोक्ष का भागी होता है। जो कार्तिकमें ‘ॐ नमो नारायणाय’ इस मन्त्र से श्रीहरि के आराधन करता है, वह नरक के दुःखों से मुक्त हो, रोग-शोक से रहित वैकुण्ठ धाम की प्राप्ति होता है। कार्तिक मास में जो मनुष्य विष्णु सहस्रनाम तथा गजेन्द्र मोक्ष का पाठ करता है, उसे फिर संसार में जन्म नहीं होता।
सुनो। जो कार्तिक मास में रात्रि के पिछले भाग में भगवान की स्तुतिका गान करता है, वह प्रियो सहित श्वेतद्वीप में निवास करता है। आषाढ़ के शुक्ल पक्ष में एकादशी तिथि के शंखासुर दैत्य मारा गया है। अतः उसी दिन से आरम्भ करके भगवान् चार मास तक क्षीरसागर में शयन करते हैं और कार्तिक शुक्ल एकादशी को जागते हैं। इस कारण वैष्णवों को एकादशी के निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण करके भगवान को जगाना चाहिये—

कार्तिक मास द्वादशी तिथि का महात्म्य
कार्तिक मास द्वादशी तिथि का महात्म्य

उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गोविन्द उत्तिष्ठ गरुडध्वज।
उत्तिष्ठ कमलाकान्त त्रैलोक्यमंगलम् कुरु॥

हे गोविन्द! उठिये, उठिये, हे गरुडध्वज! उठिये, हे कमलाकान्त! त्रिलोक का मंगल कीजिये।

ऐसा कहकर प्रातःकाल शंख आदि नगाड़े आदि बजवाये वीणा, वेणु और मृदंग आदि मधुर ध्वनि के साथ नृत्य-गीत और कीर्तन आदि करे। देवेश्वर श्रीविष्णु को उठाकर उनकी पूजा करे और सायंकाल में तुलसी की वैवाहिक विधि के सम्पन्न करे। एकादशी सदा ही पवित्र है, विशेषतः कार्तिक की एकादशी परम पुण्यमयी मानी गयी है।

उत्तम बुद्धिवाला मनुष्य वृद्ध माता-पिता का विधि पूर्वक पूजन करके अपनी स्त्रियों के साथ भगवान विष्णु के प्रसाद को भक्षण करे। जो इस प्रकार विधिसे द्वादशी व्रत काअनुष्ठान करता है, वह मनुष्य उत्तम सुखों का उपभोग करके अन्त में मोक्ष को प्राप्त होता है।

मुनिश्रेष्ठ! जो मनुष्य द्वादशी तिथि के इस परम उत्तम पुण्यमय महात्म्य का पाठ अथवा श्रवण करता है, वह उत्तम गति को प्राप्त होता है।


स्रोत
एकादशी को भगवान को जगाने की विधि, कार्तिक व्रत का उद्यापन, और अंतिम तीन तिथियों के महिमा के साथ ग्रन्थ का उपसंहार।
वैष्णव खंड – कार्तिक मास का माहात्म्य
गीता प्रेस, संक्षिप्त पद्म पुराण – पेज संख्या ४४१,


 

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