आज का पंचांग बुधवार, 22 जुलाई 2026 | New Delhi
तिथि: शुक्ल अष्टमी नक्षत्र: अनुराधा राशि: वृश्चिक योग: इन्द्र पूरा पंचांग देखें →

पाप, पुण्य, कर्म, अकर्म और विकर्म क्या है?

इस लेख में हमने दो प्रश्नो के उत्तर लिखे है जो की श्रीमद्भगवद्गीता ज्ञान से लिए गए है।

पाप, पुण्य, कर्म, अकर्म और विकर्म क्या है?

यहाँ आप जानेगे –

  1. पाप और पुण्य क्या है और कैसे प्राप्त होते है?
  2. कर्म अकर्म और विकर्म क्या हैं?

प्रश्न-1: पाप और पुण्य क्या होता है?

श्री कृष्ण – हे पार्थ! जैसे सूर्य उदय होते ही रात का अंधकार नष्ट हो जाता है वैसे ही ज्ञान का प्रकाश अज्ञान के अंधकार को नष्ट कर देता है। फिर मनुष्य परमात्मा की तरफ जाने वाले मार्ग से कभी भटकता नहीं। ज्ञान का साक्षात्कर होने के कारण मनुष्य को समझ में आ जाता है की कैसे एक ही कर्म पाप कैसे होता है और वही कर्म पुण्य कैसे होता है.

अर्जुन – तुम कहते हैं हो कि एक ही कर्म पुण्य भी हो सकता और पाप भी, वो कैसे?

श्रीकृष्‍ण – मै बताता हु पार्थ! उदाहरण के तौर पर एक मनुष्‍य ने दूसरे मनुष्‍य की हत्या कर दी, तो मुख्य कर्म क्या हुआ? – हत्या करना, परंतु यही कर्म पुण्य भी हो सकता है और पाप भी।

अर्जुन – क्या कह रहे हो केशव?

श्रीकृष्‍ण – अर्जुन मान लो एक मनुष्य किसी कमजोर बूढ़े मनु्ष्य का धन लुटने के लिए उसकी हत्या कर देता है, तो वह क्या हुआ?

अर्जुन – निश्चय ही वह पाप है।

श्रीकृष्‍ण – और यदि, एक दुष्ट मनुष्य किसी अबला स्त्री के साथ जबरदस्ती बलात्कार करने का प्रयास कर रहा है तो उस अबला की रक्षा के लिए यदि बलात्कार करने वाले की हत्या कर दी जाए, तो वो क्या होगा?

अर्जुन – यह तो स्पष्‍ट है कि किसी असहाय स्त्री की रक्षा करना पुण्‍य ही होगा।

यह सुनकर श्रीकृष्‍ण कहते हैं कि तुमने स्वयं ही अपने प्रश्न का उत्तर दे दिया पार्थ।

क्युकी कर्म तो वही रहा, किसी की हत्या करना, परंतु उस कर्म के पीछे भावना क्या है? मारने वाले की नियत क्या है? इसी के फर्क से एक ही कर्म पाप हो सकता है अथवा पुण्य।

हे अर्जुन! अर्थात मनुष्य जिस भावना से अपना कर्म करता है उसी के हिसाब वह पाप और पुण्य में बदलता है। कर्म के इस ज्ञान के द्वारा मनुष्य को कर्म, अकर्म और विकर्म का अर्थ पता चल जाता है।

प्रश्न-2 : गीता के अनुसार कर्म, अकर्म और विकर्म क्या है?

अर्जुन – कर्म, अकर्म और विकर्म? ये क्या होता है केशव?

श्रीकृष्‍ण – हे अर्जुन!

अकर्म – जब मनुष्य निष्काम भाव (बिना फल की इच्छा) से कर्म करता है तो उस कर्म का फल उसे नहीं भोगना पड़ता है। इसलिए वह अकर्म हो जाता है।

कर्म – कर्म उसे कहते हैं तो सकाम भाव से कर्म फल की इच्‍छा से किया जाता है। उसका फल कर्म के अनुसार अवश्‍य मिलता है। अच्छे कर्म का अच्छा, और बुरे का बुरा।

यह सुनकर अर्जुन कहता है कि विकर्म?

विकर्म – तब श्रीकृष्‍ण कहते हैं कि असत्य, कपट, हिंसा आदि अनुचित और निषिद्ध कर्म करना ही विकर्म है।

यह सुनकर अर्जुन कहता है कि इसका अर्थ केशव युद्ध विकर्म है क्योंकि इसका उद्देशय हिंसा है।

श्रीकृष्ण – पार्थ! तुम अभी भी अज्ञान के अंधकार में भटक रहे हो, मैंने अभी तुम्हें बताया था कि कर्म जिस भावना से किया जाए उसी से वह पाप और पुण्य होता है।

युद्ध यदि धर्म समझकर अधर्म का और अन्याय का नाश करने के लिए किया जाए तो उस युद्ध में मरने या मारने पर भी प्राणी को स्वर्ग की प्राप्त होती है, वीरगति प्राप्त होती है।
इसलिए तुम सारी शंका और कुशंकाओं को त्याग दो और युद्ध करो।

श्रीकृष्ण – हे अर्जुन! जब तुम्हें ज्ञान प्राप्त होगा तो तुम जान जाओगे कि ये संसार मेरी ही माया है। यह संसार मेरे से ही उत्पन्न हुआ है और मैं ही इस संसार का पालक हूं और मैं ही इस संसार का संहारक हूं। ये सारी सृष्‍टि मेरी ही माया का खेल है।

Also Read – जाने कैसे मतिष्क के छः दोष / विकार / रोग मनुष्य को वामपंथी बना देते है?

One comment

  1. Bhim Mouar
    जून 16, 2025 · Reply

    bhut badhiya samjhaya hai apne.

Leave a comment

Audio Settings