आप सभी की प्रार्थना पर शास्त्र सम्मत विचार विमर्श को चुनकर आपके सामने रखेंगे ताकि आप की कुछ शंकाओ और संदेहो का समाधान हो सके।
बहुत सारी वेबसाइट लोगो को अल्पज्ञान के कारण उल्टा सीधा ज्ञान दे रही है जैसे कि –
- घर पर खाटू श्याम की पूजा के लिए उनकी तस्वीर या मूर्ति स्थापित करें।
- खाटू श्याम जी को कलियुग का देवता क्यों कहा जाता है?
- खाटू श्याम जी के नाम को राधा नाम से जोड़ते है।
इत्यादि संदेह को दूर करने के लिए आपको ये श्री स्वामी निग्रहाचार्य के शास्त्रसम्मत वचन सुनने चाहिए।
शौनक जी बोले—सूतजी! आपने गुप्तक्षेत्र के इस अत्यन्त अद्भुत, परम पावन, अनुपम तथा हर्षवर्धक माहात्म्य का वर्णन किया । यहाँ अब हम यह जानना चाहते हैं कि चण्डिल और विजय कौन थे तथा सिद्धमाता की कृपा से उन्होंने कैसे सिद्धि प्राप्त की ?
यह सब यथार्थरूप से कहिये ।
उग्रश्नवा ( सूतजी ) – ने कहा–ब्रह्मन्! इस विषय में मैं श्रीव्यास जी के मुख से सुनी हुई कथा कहूँगा। पहले की बात है, पाण्डवों ने राजा द्रुपद की पुत्री द्रौपदी को पाकर धृतराष्ट्र की आज्ञा से इन्द्रप्रस्थ नामक नगर बसाया। वे वहाँ भगवान् वासुदेव से सुरक्षित होकर रहते थे।
एक समय पाण्डव अपनी राजसभा में बैठकर नाना प्रकार की बातें कर रहे थे, इतने ही में भीम का पुत्र घटोत्कच वहाँ आया। उसे आया देख पाँचों भाई पाण्डव तथा परम पराक्रमी श्रीकृष्ण सहसा सिंहासन से उठे और बड़ी प्रसन्नता के साथ सबने घटोत्कच को हृदय से लगाया। भीमनन्दन घटोत्कच ने भी अत्यन्त विनीत भाव से उन सबको प्रणाम किया ।
तत्पश्चात् राजा युधिष्ठिरने उसे अपनी गोद में बिठाकर आशीर्वाद दिया और स्नेहपूर्वक उसका मस्तक सूँघते हुए सभा में इस प्रकार पूछा-‘बेटा! कहाँ से आते हो? इतने दिनों तक कहाँ विचरते रहे ? हिडिम्बाकुमार ! तुम देवता, ब्राह्मण, गौ तथा साधु-महात्माओं का कोई अपराध तो नहीं करते हो ? भगवान् श्रीकृष्ण में और हमलोगों में तुम्हारा प्रेम तो है न? तुम्हारा अत्यन्त प्रिय करने वाली तुम्हारी माता हिडिम्बा तो खूब प्रसन्न है न?’
धर्मराज के इस प्रकार पूछने पर हिडिम्बाकुमार ने ‘कहा – महाराज! मेरे मामा के मारे जाने पर मैं उसी के राज्य सिंहासन पर बिठाया गया हूँ और दुष्टों का दमन करता हुआ सर्वत्र विचरता हूँ। मेरी माता हिडिम्बा देवी भी कुशलसे हैं, वे इस समय दिव्य तपस्या में लगी हुई हैं। उन्होंने मुझे आज्ञा दी है-बेटा! तुम सदा अपने पिता पाण्डवों में भक्ति रखने वाले बनो।’ माता की यह बात सुनकर मैं भक्तियुक्त चित्त से आपको प्रणाम करने के लिये ही मेरुगिरि के शिखर से यहाँ आया हूँ। मेरी इच्छा है कि आप लोग मुझे किसी महान् कार्य में नियुक्त करें। क्योंकि यही इस जीवन का महान् फल है कि पुत्र सदा अपने पितृवर्ग की आज्ञा का पालन करे। इससे वह पुण्य लोक पर विजय पाता है और इस संसार में भी यशस्वी होता है।
घटोत्कच के ऐसा कहने पर धर्मराज युधिष्ठिर उससे इस प्रकार बोले— बेटा! तुम्हीं हमारे भक्त और सहायक हो। हिंडिम्बाकुमार! निश्चय ही जैसी माता होती है, वैसा ही उसका पुत्र भी होता है। तुम्हारी माता हम लोगों के प्रति अविचल भक्ति रखनें वाली है, तुम भी ऐसे ही हो। अहो! मेरी प्यारी पतोहू हिंडिम्बा देवी बड़ा कठिन कार्य कर रही है, जो कि अपने प्यारे पति की सेवा का सुख छोड़कर तपस्या में ही संलग्न है।
इस प्रकार बहुत-सी बातें कहकर धर्मराज ने भगवान् श्रीकृष्ण से कहा – पुण्डरीकाक्ष! आप तो जानते ही हैं कि घटोत्कच का जन्म भीमसेन से है। यह उत्पन्न तरुण हो गया था। श्रीकृष्ण! मैं चाहता हूँ, मेरे इस पुत्र को योग्य पत्नी प्राप्त हो, आप सर्वज्ञ हैं, बताइये, इसके योग्य पत्नी कौन हो सकती है?
धर्मराज के ऐसा कहने पर भगवान् श्रीकृष्ण ने क्षण भर ध्यान करके उनसे कहा – राजन् ! मैं बतलाता हूँ, घटोत्कच के योग्य एक बड़ी सुन्दरी स्त्री है, जो इस समय प्राग्ज्योतिषपुर में निवास करती है। अद्भुत पराक्रम करने वाला जो मुर नामक दैत्य था, उसी की वह पुत्री है। मुर दैत्य बड़ा भयंकर था और पाशमय दुर्ग में रहता था। वह मेरे हाथ से मारा गया। उसके मारे जाने पर उसकी पुत्री कामकटंकटा मुझसे युद्ध करने के लिये आयी। वह अत्यन्त पराक्रमी होने के कारण बड़ी भयानक जान पड़ती थी। तब खड्ग और खेटक धारण करने वाली उस दैत्य-कन्या के साथ महासमर में मैंने भी युद्ध आरम्भ किया। मेरे शार्ङ्ग नामक धनुष से बड़े-बड़े बाण छूटने लगे, परंतु मुर की पुत्री ने मेरे उन सभी बाणों को खड्ग से ही काट डाला | तब मैंने उसका वध करने के लिये अपना सुदर्शन चक्र उठाया।
यह देख कामाख्या देवी मेरे आगे आकर खड़ी हो गयी और इस प्रकार बोली – पुरुषोत्तम ! आपको इसका वध नहीं करना चाहिए। मैंने स्वयं इसको खड्ग और खेटक प्रदान किए हैं, जो अजेय हैं।
कामाख्या देवी की यह बात सुनकर मैंने कहा—शुभे! मैं भी इस युद्ध से निवृत्त होता हूँ, तुम इस कन्या को मना करो ।
तब कामाख्या देवी ने उसे हदय से लगाकर कहा – भद्रे! तुम युद्ध से लौट चलो। ये माधव श्रीकृष्ण युद्ध में दुर्जय हैं। कोई किसी प्रकार भी संग्राम में इन्हें मार नहीं सकता। संसार में ऐसा कोई वीर न तो हुआ है, न है और न होगा ही, जो इन्हें युद्ध में जीत सके। औरों की तो बात ही क्या है, साक्षात् भगवान् शंकर भी इन्हें परास्त नहीं कर सकते। बेटी! ये तुम्हारे भावी श्वशुर हैं; अतः तुम इन्हें प्रणाम करके युद्ध से हट जाओ । यही तुम्हारे लिये उचित होगा । तुम इनके भाई भीमसेन की पुत्रवधू होओगी। इसलिये अपने श्वशुर के समान पूजनीय जनार्दन का तुम आदर करो। अब पिता के लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये। इन श्रीकृष्ण के हाथ से जो तुम्हारे पिता की मृत्यु हुई है, वह सर्वथा स्पृहणीय है; क्योंकि इनके हाथ से मरने पर अब तुम्हारे पिता सब पातकों से मुक्त होकर विष्णुधाम में चले गये।’
कामाख्या के ऐसा कहने पर कामकटंकटा ने क्रोध त्याग दिया और विनीत अंगों से मुझे प्रणाम किया। तब मैंने उसे आशीर्वाद देकर कहा- “बेटी ! तुम भगदत्त से सम्मानित होकर इसी नगर में निवास करो। यहाँ रहती हुई ही तुम वीर हिडिम्बाकुमार को पतिरूप में प्राप्त करोगी।’
इस प्रकार आश्वासन देकर मैंने कामाख्या देवी तथा मौर्वी (मुरपुत्री को विदा किया। फिर वहाँ से द्वारका होते हुए मैं यहाँ आकर आपसे मिला हूँ। अत: वह मुरदैत्य की सुन्दरी कन्या ही घटोत्कच के लिए योग्य स्त्री है। मैं श्वशुर हूँ, इसलिये मेरे द्वारा उसके रूप का वर्णन करना उचित न होगा। साधु पुरुष के लिये यह कदापि उचित नहीं है कि ‘वह स्त्रियों के रूप-सौन्दर्य का वर्णन करे। एक बात और सुन लीजिए। उसने प्रतिज्ञा कर रखी है कि जो मुझे किसी प्रश्न पर निरुत्तर करके जीत ले तथा जो मेरे समान ही बलवान् हो, वही मेरा पति होगा। उसकी यह प्रतिज्ञा सुनकर बहुत-से दैत्य तथा राक्षस उसे जीतने के लिये गये किंतु मौर्वी ने उन सबको परास्त करके मार डाला। यदि महापराक्रमी घटोत्कच ऐसी मौर्वी को जीतने का उत्साह रखता हो तो वह अवश्य ही इसकी पत्नी होगी।’
युधिष्ठिर बोले – प्रभो ! उसके सब गुणों से क्या लाभ है, जब उसमें यह एक ही महान् अवगुण भरा हुआ है। उस दूध को लेकर क्या किया जाएगा जिसमें विष मिला दिया गया हो? अपने प्राणों से भी अधिक प्यारे भीमसेन कुमार को केवल साहस के भरोसे कैसे इस संकट में डाल दें ? यह बेचारा तो शुद्ध वाक्य भी बोलना नहीं जानता। जनार्दन! देश-देश में और भी तो बहुत-सी स्त्रियाँ हैं, उन्हीं में से किसी उत्तम स्त्री को बतलाइये।
भीमसेन बोले-भगवान् श्रीकृष्ण ने जो बात कही है, वह अनेक प्रयोजनों को सिद्ध करने वाली, सत्य और उत्तम है। मेरा विश्वास है, घटोत्कच शीघ्र ही मौर्वी को प्राप्त करेगा।
अर्जुन बोले-कामाख्या देवी ने मौर्वी से कहा है, ‘ भद्रे! भीमसेन का पुत्र तुम्हारा पाणिग्रहण करेगा।’
इस कारण मेरी राय यही है कि घटोत्कच शीघ्र वहाँ जाय।
श्रीभगवान् बोले-अर्जुन! मुझको तुम्हारी और भीम की बात पसंद है। हिडिम्बाकुमार! बोलो तुम्हारी कया राय है?
घटोत्कच ने कहा-पूजनीय पुरुषों के आगे अपने गुणों का वर्णन करना उचित नहीं है। सूर्य की किरणें और उत्तम गुण व्यवहार में आकर ही प्रकाशित होते हैं। मैं सर्वथा ऐसी चेष्टा करूँगा, जिससे मेरे निर्मल पिता पाण्डव मुझ पुत्र के कारण सत्पुरुषों की सभा में लज्जित न हों। यों कहकर महाबाहु घटोत्कच ने उन सबको प्रणाम किया। फिर पितरों से विजय का आशीर्वाद पाकर उत्साह सम्पन्न हो वहाँ से जाने का विचार किया ।
उस समय भगवान् जनार्दन ने उसकी प्रशंसा करके कहा-‘ बेटा ! कथा कहते समय विजय की प्राप्ति कराने वाले मुझ श्रीकृष्ण का स्मरण अवश्य कर लेना, जिससे मैं तुम्हारी दुर्भद्य बुद्धि को अविलम्ब बढ़ा दूँगा।’
ऐसा कहकर श्रीकृष्ण ने उसे हृदय से लगाया और आशीर्वाद देकर विदा किया।
तदनन्तर हिडिम्बाकुमार महापराक्रमी घटोत्कच सूर्याक्ष, बालाख्य और महोदर-इन तीन सेवकों के साथ आकाशमार्ग से चला और दिन बीतते-बीतते प्राग्ज्योतिषपुर में जा पहुँचा। वहाँ जाने पर घटोत्कच ने प्राग्ज्योतिषपुर से बाहर एक सोने का सुन्दर भवन देखा, जो एक विशाल वाटिका में शोभा पा रहा था। उसकी ऊँचाई एक हजार मंजिल की थी। मेरुपर्वत के शिखर की भाँति सुशोभित होने वाले उस भवन के पास पहुँचकर घटोत्कच ने देखा–दरवाजे पर एक सखी खड़ी है। उसका नाम “कर्णप्रावरणा’ था।
वीर हिंडिम्बाकुमार ने सरस भाषा में उससे पूछा- कल्याणी! मुर की पुत्री कहाँ हैं? मैं दूर देशसे आया हुआ उनकी कामना करने वाला अतिथि हूँ और उन्हें देखना चाहता हूँ।’ भीमसेन कुमार की यह बात सुनकर वह निशाचरी लड़खड़ाती हुई दौड़ी और महल की छतपर बैठी हुई मौर्वी के पास जाकर इस प्रकार बोली- देवि! कोई सुन्दर तरुण काम का अतिथि होकर तुम्हारे द्वार पर खड़ा है। उसके समान सुन्दर कान्ति वाला पुरुष कोई त्रिलोकी में भी नहीं होगा। अत: अब उसके लिये क्या कर्तव्य है, यह आज्ञा दीजिये।’
‘कामकटंकटा बोली–अरी ! उन्हें शीघ्र ले आ, क्यों विलम्ब करती है ? कदाचित् दैवकी सहायता से उन्हीं के द्वारा मेरी प्रतिज्ञा की पूर्ति हो जाय।
मौर्वी के ऐसा कहने पर दासी ने घटोत्कच के पास जाकर कहा-कामी पुरुष! उस मृत्युरूपा नारी के समीप शीघ्र जाओ । उसके ऐसा कहने पर हँसते हुए घटोत्कच ने वहीं पर अपना धनुष छोड़कर घर के भीतर प्रवेश किया और विद्युत की भाँति प्रकाशित होने वाली उस दैत्य-कन्या को देखकर इस प्रकार सोचा–‘ अहो ! मेरे पितृस्वरूप श्रीकृष्ण ने मेरे लिये योग्य स्त्री को ही बतलाया है।’ इस प्रकार विचार करते हुए उसने मौर्वी से कहा– ओ वज्र के समान कठोर हृदय वाली निष्ठुर नारी! मैं अतिथि होकर तुम्हारे घर आया हूँ। अतः सत्पुरुषोंके लिये जो उचित स्वागत-सत्कार है, वह अपने हार्दिक भाव के अनुसार करो।’
हिंडिम्बा कुमार का यह वचन सुनकर कामकटंकटा उसके रूप से विस्मित हो अपनी निंदा करके इस प्रकार बोली-‘ भद्रपुरुष ! तुम व्यर्थ ही यहाँ चले आये। जीते-जी पुन: सुखपूर्वक लौट जाओ, अथवा यदि मुझे चाहते हो तो शीघ्र कोई कथा कहो । कथा कहकर यदि मुझे सन्देह में डाल दोगे तो मैं तुम्हारे वश में हो जाऊँगी। उसके बाद मेरे द्वारा तुम्हारी सेवा होगी।’
उसके ऐसा कहने पर घटोत्कच ने यह सम्पूर्ण चराचर जगत् जिनकी कथा है, उन भगवान् श्रीकृष्ण का स्मरण करके कथा प्रारम्भ की ।
मान लो किसी पत्नी के गर्भ से कोई बालक उत्पन्न हुआ जो युवा होने पर बड़ा अजितेन्द्रिय निकला। उस युवक के एक पुत्री हुई तथा उसकी पत्नी मर गयी। तब पिताने ही उस नन्ही-सी पुत्री की रक्षा एवं पालन-पोषण किया। वह कन्या जब जवान हुई और उसके सब अंग विकसित हो गये, तब उसके पिता का मन उसके प्रति कामलोलुप हो उठा। तदनन्तर उस पापी ने अपनी ही पुत्री से कहा–‘प्रिये! तुम मेरे पड़ोसी की लड़की हो। मैंने तुम्हें अपनी पत्नी बनाने के लिये यहाँ लाकर दीर्घकाल तक पालन-पोषण किया है। अत: अब मेरा वह अभीष्ट कार्य सिद्ध करो।’ उसके ऐसा कहने पर उस लड़की ने ऐसा ही माना। उसने इसे पतिरूप में स्वीकार किया और इसने उसे पत्नीरूप में । तत्पश्चात् उस कामी गधे से एक कन्या उत्पन्न हुई। अब बताओ, वह कन्या उसकी क्या लगेगी– पुत्री अथवा दौहित्री ?’ यदि तुममें शक्ति है, तो मेरे इस प्रश्न का शीघ्र उत्तर दो।’
यह प्रश्न सुनकर मौर्वी ने अपने हृदय में अनेक प्रकार से विचार किया, किंतु किसी प्रकार उसे इस प्रश्न का निर्णय नहीं सूझता था। तब उस प्रश्न से परास्त होकर मौर्वी ने अपनी शक्ति का उपयोग किया। वह ज्यों ही झूले से सहसा उठकर हाथ में तलवार लेना चाहती थी त्यों ही घटोत्कच ने बड़े वेग से पहुँचकर बायें हाथ से उसके केश पकड़ लिये और धरती पर गिरा दिया। फिर उसके गले पर बायाँ पैर रखकर दाहिने हाथ में कतरनी ले, उसकी नाक काट लेने का विचार किया। मौर्वी ने बहुत हाथ-पैर मारे, किंतु अन्त में शिथिल होकर उसने मन्द स्वर में कहा-‘नाथ! मैं तुम्हारे प्रश्न से और शक्ति तथा बल से परास्त हो गयी हूँ। तुम्हें नमस्कार है। अब मुझे छोड़ दो, मैं तुम्हारी दासी हूँ। जो आज्ञा दो वही करूँगी।’
घटोत्कच ने कहा-यदि ऐसी बात है तो लो, मैंने तुम्हें छोड़ दिया। ‘घटोत्कच के यों कहकर छोड़ देने पर कामकटंकटा ने पुन: उसे प्रणाम किया और कहा-‘महाबाहो ! मैं जानती हूँ, तुम बड़े वीर हो। त्रिलोकी में कहीं भी तुम्हारे पराक्रम की तुलना नहीं है। तुम इस पृथ्वी पर साठ करोड़ राक्षसों के स्वामी हो। ये बातें मुझे कामाख्या देवी ने बतलायी थीं, वे सब आज याद आ रही हैं। मैंने अपने सेवकों तथा इस शरीर के साथ यह सारा घर तुम्हारे चरणों में समर्पित कर दिया। प्राणनाथ! आज्ञा दो, मैं तुम्हारे किस आदेश का पालन करूँ?’
घटोत्कचने कहा-मौर्वी ! जिसके पिता और भाई-बन्धु मौजूद हैं, उसका विवाह छिपकर हो, यह किसी प्रकार उचित नहीं है। इसलिये अब तुम शीघ्र मुझे इन्द्रप्रस्थ ले चलो। यही हमारे कुल की परिपाटी है। इन्द्रप्रस्थ में गुरुजनों की आज्ञा लेकर मैं तुमसे विवाह करूँगा। तदनन्तर मौर्वी अनेक प्रकार की सामग्री साथ ले घटोत्कच को अपनी पीठ पर बैठाकर इन्द्रप्रस्थ में आयी।
भगवान् श्रीकृष्ण और पाण्डवों ने घटोत्कच का अभिनन्दन किया, उसके बाद शुभ लग्न में भीमकुमार ने मौर्वी का पाणिग्रहण किया। कुन्ती और द्रौपदी दोनों ही वधू को देखकर बहुत प्रसन्न हुईं। विवाह- सम्बन्ध हो जाने पर राजा युधिष्ठिर ने घटोत्कच का आदर-सत्कार करके उसे पत्नी सहित अपने राज्य को जाने का आदेश दिया। महाराज की आज्ञा शिरोधार्य करके हिडिम्बाकुमार अपनी राजधानी हिडम्ब-वन को चला गया। वहाँ उसने मौर्वी के साथ बहुत दिनों तक क्रीड़ा की।
तदनन्तर समयानुसार उसके गर्भ से एक महातेजस्वी एवं बालसूर्य के समान कान्तिमान् बालक उत्पन्न हुआ, जो जन्म लेते ही युवावस्था को प्राप्त हो गया। उसने माता-पिता से कहा-मैं आप दोनों को प्रणाम करता हूँ, बालक के आदिगुरु माता-पिता ही हैं। अत: आप दोनों के दिये हुए नाम को मैं ग्रहण करना चाहता हूँ।’
तब घटोत्कच ने अपने पुत्र को छाती से लगाकर कहा-‘ बेटा! तुम्हारे केश बर्बराकार (घुँघराले) हैं, इसलिये तुम्हारा नाम ‘बर्बरीक’ होगा। महाबाहो ! तुम अपने कुल का आनन्द बढ़ाने वाले होओगे। तुम्हारे लिये जो परम कल्याणमय वस्तु है, उसको हमलोग द्वारकापुरी चलकर यदुकुलनाथ भगवान् वासुदेव से पूछेंगे।’
तदनन्तर कामकर्टकटा को घर पर ही छोड़कर बुद्धिमान् घटोत्कच अपने पुत्र को साथ ले आकाशमार्ग से द्वारका को गया। वहाँ यादवों की सभा में पहुँचकर उसने उग्रसेन, वसुदेव, सात्यकि, अक्रूर, बलराम तथा श्रीकृष्ण आदि प्रधान-प्रधान यदुवीरों को प्रणाम किया। पुत्र सहित घटोत्कच को अपने चरणों में पड़ा देख भगवान् श्रीकृष्ण ने उसको और उसके पुत्र को भी उठाकर छाती से लगा लिया और आशीर्वाद दे अपने समीप बिठाकर इस प्रकार पूछा-‘बेटा! कुरुवंश को बढ़ाने वाले राक्षस श्रेष्ठ ! बतलाओ, तुम्हें सब ओर से कुशल तो है न? यहाँ किसलिये तुम्हारा आगमन हुआ है?’
घटोत्कच बोला-देव! आपके प्रसाद से मुझे सब ओर से कुशल ही है। आपकी बतायी हुईं स्त्री मौर्वी के गर्भ से मेरे इस पुत्र का जन्म हुआ है, यह आपसे कुछ प्रश्न पूछेगा; उसे सुनिये। इसीलिए मैं यहाँ आया हूँ।
श्री भगवान ने कहा-बेटा मौर्वेय ! तुम्हें जो- जो पूछने की इच्छा हो, सब पूछ लो।
बर्बरीक बोला-आर्यदेव माधव! मैं मन, बुद्धि और समाधि के द्वारा आपको प्रणाम करके यह पूछता हूँ कि संसार में उत्पन्न हुए जीव का कल्याण किस साधन से होता है? कोई धर्म को कल्याणकारक कहते हैं तो कोई ऐश्वर्यदान को । कुछ लोग दम (इन्द्रिय-संयम)-को, कोई तपस्या को, कोई द्रव्य को, कोई भोगों को तथा कोई मोक्ष को ही श्रेय कहते हैं।
पुरुषोत्तम ! इस प्रकार सैकड़ों श्रेयों में से किसी एक श्रेय को निश्चित करके बतलाइये जो मेरे इस कुल के लिये कल्याणकारी हो।
श्री भगवान् बोले-बेटा! प्रत्येक वर्ण के लिए पृथक्-पृथक् उत्तम श्रेय बताया गया है ।
ब्राह्मणों के कल्याण का मूल है–तप, इन्द्रिय-संयम तथा स्वाध्याय । मनीषी पुरुषों ने धर्म के स्वरूप का निरूपण भी ब्राह्मणों के लिये कल्याण की बात बतायी है।
क्षत्रियों के लिए सर्वप्रथम बल ही साध्य है, यह बात पहले ही बताई गई है। दुष्टोंका दमन और साधुओं का संरक्षण भी क्षत्रियों के लिये श्रेयस्कर है ।
वैश्यों के श्रेय का साधन है—पशुपालन और कृषि विज्ञान ।
शूद्र के लिये द्विजों की सेवा ही श्रेयस्कर है, उसके द्वारा जीवन-निर्वाह करने वाला शूद्र सुखी होता है। अथवा शूद्र भाँति-भाँति के शिल्पकर्मो द्धारा जीविका चलावे और द्विजातियों के हित में लगा रहे ।
तुम क्षत्रिय कुल में उत्पन्न हुए हो, अतः अपना कर्तव्य सुनो । पहले तुम ऐसे बल की प्राप्ति के लिए साधन करो, जिसकी कहीं तुलना न हो। फिर उस बल से दुष्टों का दमन और साधु पुरुषों का पालन करो। ऐसा करने से तुम्हें स्वर्गलोक की प्राप्ति होगी । बेटा! देवियों की अत्यन्त कृपा होने से ही बल प्राप्त होता है, इसलिये तुम बल प्राप्त करने के उद्देश्य से देवी की आराधना करो।
बर्बरीक ने पूछा-प्रभो ! मैं किस क्षेत्र में, किस देवी की, कैसे आराधना करूँ?
उसके इस प्रकार पूछने पर भगवान् दामोदर ने क्षण भर ध्यान करके कहा-महीसागर संगम तीर्थ में, जो गुप्तक्षेत्र के नाम से विख्यात है, वहीं नारदजी द्वारा बुलायी हुई नौ दुर्गाएँ निवास करती हैं। वहाँ जाकर उनकी आराधना करो।
बर्बरीक से ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्ण ने घटोत्कच से कहा– ” भीमनन्दन ! तुम्हारा यह पुत्र अत्यन्त सुन्दर हृदय वाला है, इसलिये मैंने इसे ‘सुहृदय‘ यह दूसरा नाम प्रदान किया है।’ यों कहकर भगवान् ने उसे छाती से लगा लिया और नाना प्रकार के धन से उसको सन्तुष्ट करके गुप्तक्षेत्र में जाने का आदेश दिया।
‘तब भगवान् श्रीकृष्ण को, अपने पिता घटोत्कच को और वहाँ बैठे हुए सब यादवों को प्रणाम करके उन सबकी आज्ञा ले बर्बरीक गुप्तक्षेत्र को चला गया। घटोत्कच भी भगवान् श्रीकृष्ण से विदा ले अपने वन को गया और पुत्र के गुणों का स्मरण करता हुआ अपने राज्य का पालन करने लगा।
तदनन्तर बुद्धिमान् सुहृदय गुप्तक्षेत्र में रहकर प्रतिदिन कर्म के द्वारा पुष्प, धूप और नाना प्रकार के उपहारों से तीनों समय देवियों की पूजा करने लगा। तीन वर्षो तक आराधना करने पर देवियाँ उस पर बहुत सन्तुष्ट हुईं और प्रत्यक्ष दर्शन देकर उन्होंने उसको ऐसा दुर्लभ बल प्रदान किया, जो तीनों लोकों में किसी के पास नहीं है।
तत्पश्चात् वे बोलीं–‘ महाद्युते ! कुछ काल तक तुम यहीं निवास करो। फिर विजय की संगति पाकर तुम अधिक ‘कल्याणके भागी होओगे।’ देवियों के ऐसा कहने पर सुह्दय वहीं ठहर गया।
तदनन्तर मगध देश के ब्राह्मण विजय वहाँ आये । उन्होंने कुमारेश्वर आदि सात लिंगों का पूजन किया और अपनी विद्या को सफल बनाने के लिये चिरकाल तक देवियों की आराधना की । इससे सन्तुष्ट होकर देवियों ने स्वन में यह आदेश दिया–‘ ब्रह्मन! तुम ऑँगन में सिद्धमाता के आगे सम्पूर्ण विद्याओं का साधन करो। सुहृदय हमारा भक्त है, यह तुम्हारी सहायता करेगा।’ यह बात सुनकर विजय उठा और सब देवियों को प्रणाम करके उसने भीमपौत्र सुहृदय से कहा– “तुम निद्रारहित एवं पवित्र हो देवी के स्तोत्र का पाठ करते हुए यहीं रहो, जिससे जब तक मैं यह विद्या-साधन रूप कर्म करूँ तब तक किसी प्रकार का विघ्न न आने पावे।’
विजय के ऐसा कहने पर महाबली बर्बरीक जब विघ्न निवारण के लिये वहाँ खड़ा हुआ, तब विजय ने सुखपूर्वक आसनपर बैठकर ‘गुं गुरुभ्यो नम: ‘इस मन्त्र से गुरुओं को नमस्कार किया । उसके बाद उक्त गुरु-मन्त्र का अष्टिोत्तर शत जप करके पुन: गुरुजनों को प्रणाम करने के पश्चात् गणेश्वर- विधान आरम्भ किया। अब मैं गणपति के उस उत्तम मन्त्रका वर्णन करता हूँ जो बहुत छोटा होने पर भी समस्त कार्यो का साधक, महान् प्रयोजनों की प्राप्ति कराने वाला तथा सब प्रकार की सिद्धि देनेवाला है। ‘ॐ गां गीं गूं गै गौँ ग: ‘ यह सात अक्षरों का मन्त्र है। मन्त्र का विनियोग-वाक्य इस प्रकार है- ॐ अस्य गणपतिमन्त्रस्य गणो नाम ऋषिविघ्नेश्वरो देवता ग॑ बीजम् ॐ शक्ति: पूजार्थे जापार्थे तिलकार्थे वा मनईप्सितार्थे होमार्थे वा विनियोग: ।’ अर्थात् इस गणपति-मन्त्र के गण नामक ऋषि, विष्नेश्वर देवता, ग॑ बीज और ॐ शक्ति है। पूजा, जप, तिलक, मनोरथसिद्धि अथवा होम के लिये इसका विनियोग है। पूर्वोक्त मूल-मन्त्र से चन्दन, गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य और ताम्बूल निवेदन करे। इसके बाद मूल-मन्त्र का जप करे। अष्टोत्तर शत, सहस्र, लक्ष अथवा कोटि बार यथाशक्ति जप करके दशांश हवन के लिये अग्निदेव का आवाहन करे। आवाहन के पश्चात् ग॑ गणपतये स्वाहा’ इस मन्त्र से गुग्गुल की गोलियों द्वारा होम करे। जो इस प्रकार सब विघ्नों में इस उत्तम मन्त्र का साधन करता है, उसके समस्त विघ्न नष्ट होते हैं और उसे मनोअभीष्ट वस्तु की प्राप्ति हो जाती है। विजय भी इस गणेश्वरकल्प को जानते थे। अतः उन्होंने अष्टोत्तर शत् जप करके. गुग्गुल की गुटिकाओं द्वारा दशांश आहुति दी और सिद्धि विनायक का पूजन किया । इसके बाद सिद्धाम्बिका को नमस्कार करके अपराजिता नामक वैष्णवी महाविद्या का साधन सहित जप किया, जिसके स्मरणमात्र से सब दुःखों का नाश हो जाता है।
विप्रवर ! मैं उस विद्या का वर्णन करता हूँ, सुनो- ॐ भगवान् वासुदेव को नमस्कार है; सहस्त्र मस्तकों वाले भगवान् अनन्त को नमस्कार है; जो क्षीर समुद्र में शयन करते हैं, शेषनाग का विशाल शरीर जिनकी शय्या है, गरुड़ जिनका वाहन है, जो पीताम्बर धारण करते हैं, वासुदेव, संकर्षण, प्रधुम्न और अनिरुद्ध – ये चारों व्यूह जिनके स्वरूप हैं; जिन्होंने हयग्रीवरूप धारण किया है; उन्हीं भगवान् विष्णु को नमस्कार है। नृसिंह ! वामन! त्रिविक्रम ! तथा वरदायक राम ! आपको नमस्कार है। विश्वरूप! बहुरूप! मधुसूदन ! महावराह ! महापुरुष! वैकुण्ठ ! नारायण! पद्मनाभ! गोविन्द! दामोदर ! हषीकेश ! समस्त असुरों का संहार करने वाले ! सम्पूर्ण प्राणियों को अपने वश में रखने वाले ! सब दुःखों का नाश करने वाले सम्पूर्ण विपत्तियों का भंजन करने वाले ! सब नागों का मान मर्दन करने वाले ! सर्वदेव महेश्वर ! सबका बन्धन छुड़ाने वाले ! सब शत्रुओं का संहार करने वाले ! समस्त ज्वरों का नाश करने वाले! सम्पूर्ण ग्रहों का निवारण तथा सब पापों का शमन करने वाले! भक्तजन-आनन्ददायक ! जनार्दन ! आपको नमस्कार है। आपके लिये सुन्दर हविष्य का भाग समर्पित है । जो साधक इस अपराजिता वैष्णवी महाविद्या का ‘जप, पाठ, श्रवण, स्मरण, धारण और कीर्तन करता है उसे वायु, अग्नि, वत्र, पत्थर, बिजली और वर्षा का भय नहीं प्राप्त होता। उसके लिये समुद्र से, ग्रहों से तथा चोरों से भी भय नहीं रहता है।
इस प्रकार विजय ने संयमशील होकर मन, बुद्धि और समाधि के द्वारा इस अपराजिता वैष्णवी महाविद्या का साधन आरम्भ किया। जो बिना साधन के भी प्रतिदिन इस विद्या का पाठ करता है, उसके भी समस्त विघ्न नष्ट हो जाते हैं। विजय साधन में लगे थे। उस समय रात्रि के पहले पहर में एक राक्षसी ने विघ्न उपस्थित किया, किन्तु बर्बरीक ने उस राक्षसी को भगा दिया । तत्पश्चात् आधी रात में दूसरा विघ्न उपस्थित हुआ; बर्बरीक ने उसका भी निवारण कर दिया। तदनन्तर रेपलेन्द्र नामका एक दानव विजय की ओर दौड़ा । उसका शरीर एक योजन लम्बा था। उसके मस्तक और उदर सौ-सौ थे। वह अपने मुखों से अग्नि की बड़ी भारी ज्वाला उगलता हुआ आ रहा था। उसे दौड़कर आते देख महाबली बर्बरीक भी उसकी ओर वेग से आगे बढ़ा | दोनों बहुत देर तक स्थिरता पूर्वक युद्ध करते रहे । फिर बर्बरीक ने उसे भूमि पर गिराकर खूब रगड़ा और तब तक नहीं छोड़ा, जबतक उसके प्राण नहीं निकल गये। मरने पर उसे अग्निकोण में महीसागरसंगम के तट पर फेंक दिया। इस प्रकार उसका वध करके वीर बर्बरीक पुन: विजय की रक्षा के लिये खड़ा हो गया। तत्पश्चात् तीसरे पहर में पश्चिम दिशा की ओरसे एक राक्षसी आयी, जो पर्वताकार दिखायी देती थी | वह बड़े जोर-जोर से गर्जना करती और अपने पैरों की धमक से पृथ्वी को कँपाती हुई चलती थी; उसका नाम ‘द्रहद्वहा’ था। उसे आती देख सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी बर्बरीक बड़े वेग से उसके समीप पहुँचा । उसने हँसते हुए मार्ग रोक लिया और मुक््के से मारकर राक्षसी को धरती पर गिरा दिया । उसके बाद गला दबाकर मार डाला। उसे मारकर बर्बरीक पुन: रक्षा के लिये खड़ा हो गया।
तदनन्तर चौथे पहर में एक अद्भुत नकली संन्यासी मूड मुड़ाये दिगम्बरवेश में वहाँ आया। उसने बड़ा भारी ब्रती होने का ढोंग रच रखा था। उसने आते ही कहा–‘ हाय हाय! अरे भाई! यह तो बड़े कष्ट की बात है। अहिंसा ही परम धर्म है! तूने यह आग क्यों जला रखी है? आग में हवन करते समय सूक्ष्म जीवों का बड़ा भारी वध हो रहा है।’
उसकी यह बात सुनकर बर्बरीक ने हँसते हुए कहा–‘ अग्नि में आहुति देने पर सब देवताओं की तृप्ति होती है। दुर्बुद्धि पापी! तू झूठ बोलता है, इसलिये दण्ड का पात्र है।’ यों कहकर बर्बरीक सहसा उसके पास ‘जाकर खड़ा हो गया और मुक््के से मार-मारकर उसके सारे दाँत गिरा दिये। वास्तवमें वह एक दैत्य था। क्षणभर में सचेत होने पर वह बर्बरीकके भय से भागा और एक गुफा के बिल में समा गया। ‘बर्बरीक ने क्रोधमें भरकर बड़े वेगसे उसका पीछा किया, किन्तु वह दैत्य वायु के समान वेग से दौड़ता पाताल में समा गया । साठ योजन विस्तृत ‘ बहुप्रभा’ नाम की नगरी में वह निवास करता था। बर्बरीक वहाँ भी उसके पीछे-पीछे जा पहुँचा । उसे देखकर “पलाशी’ नाम वाले दैत्यों में ‘दौड़ो, मारो, काटो और फाड़ डालो’ आदि के रूप में महान् कोलाहल मच गया। हल्ला सुनकर अनेक प्रकार के अस्त्र- शस्त्र धारण किये नौ करोड़ भयानक दैत्य योद्धा वीर बर्बरीक पर टूट पड़े। इस प्रकार करोड़ों दैत्योंको देखकर घटोत्कच का पुत्र क्रोध से जल उठा। उसने किन्हीं को पैरों से, किन्हीं को भुजदण्डों से और किन्हीं को छाती के धक्के से मार-मारकर क्षणभर में यमलोक पहुँचा दिया। दैत्यों के मारे जाने पर वासुकति आदि नाग वहाँ आये और नाना प्रकार के प्रिय वचनों द्वारा सुहदय की स्तुति करते हुए बोले-‘ भैमिनन्दन! आपने नागों का यह पलाशी नामक दैत्य अपने सेवकों सहित मारा गया । वीर! इस दुरात्मा ने अपने सेवकों की सहायता से भाँति-भाँति के उपाय करके हम लोगों को पीड़ा दी और पाताल से भी नीचे कर दिया था। आज आप हम नागों से कोई मनोवांछित वर माँगिये। हम सब आप पर प्रसन्न होकर वर देने को उत्सुक हैं ।’
बर्बरीक बोला–नागगण! यदि मुझे वर देना है, तो मैं यही माँगता हूँ कि विजय सब प्रकार के विघ्नो से मुक्त होकर सिद्ध प्राप्त कर लें।
तब नागों ने प्रसन्न होकर कहा-बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा। बर्बरीक नागों को वह दैत्यपुरी देकर उनके द्वारा सम्मानित हो वहाँ से लौटा। बिल के मनोहर मार्ग से लौटते समय उसने देखा, ‘कल्पवृक्ष के नीचे एक सर्वरत्नमय लिंग विराजमान है; उसका महान् प्रकाश सब ओर फैल रहा है तथा बहुत-सी नागकन्याएँ उसका पूजन कर रही हैं। यह सब देखकर बर्बरीक को बड़ा विस्मय हुआ! उसने नागकन्याओं से पूछा–‘ सूर्य और अग्नि के समान तेजस्वी इस शिवलिंग की किसने स्थापना की है? तथा इस शिवलिंग से चारों दिशाओं की ओर जो ये मार्ग गये हैं, इनका भी परिचय दो।’
वीर बर्बरीक का यह वचन सुनकर नाग- कन्याओं ने सकुचाते हुए कहा–सम्पूर्ण नागों के राजा महात्मा शेष ने तपस्या करके यहाँ इस महालिंग की स्थापना की है । इसके दर्शन, स्पर्श, ध्यान और पूजन से यह सब सिद्धियों को देने वाला है। इस लिंग से पूर्व दिशा की ओर जाने वाला यह मार्ग भूलोक में श्री पर्वत तक चला गया है। नागलोक सुविधापूर्वक वहाँ तक पहुँच सकें, इसके लिये ‘इलापत्र’ नाग ने इस मार्ग का निर्माण किया है। दक्षिण से जाने वाला यह मार्ग पृथ्वी पर ‘ शूर्पारक ‘ क्षेत्र में पहुँचता है, इसे कर्कोटक नाग ने वहाँ जाने के लिये बनवाया है। पश्चिम का यह मार्ग अतिशय प्रकाशमान प्रभास तीर्थ को जाता है, इसे ऐरावत ने नागों की यात्रा के लिये बनवाया है। इसी प्रकार उत्तर से होकर निकला हुआ यह मार्ग पृथ्वी पर कुरुक्षेत्र में जाता है, महात्मा तक्षक ने वहाँ जाने के लिये यह मार्ग तैयार किया है। लिंग से ऊपर की ओर जो मार्ग जाता है, जिससे जाने के लिये आप खड़े हैं; यह गुप्तक्षेत्र में सिद्धलिंग के पास गया है। यह मार्ग स्वामी स्कन्द ने अपनी शक्ति के प्रहार से बनाया है।
वीर! ये सब बातें ‘हमने बता दीं, अब आप हमारा निवेदन सुनिये। पहले तो यह बताइये कि आप कौन हैं ? अभी- अभी आप दैत्य के पीछे लगे गये थे और अब अकेले ही लौट रहे हैं; इसका क्या कारण है? हम सब आपकी दासियाँ हैं और पतिरूप में आपका वरण करती हैं । आप हमारे साथ यहाँ के विविध स्थानों में क्रीडा कीजिये।
बर्बरीक ने कहा–देवियो! मेरा जन्म कुरुवंश में हुआ है। मैं पाण्डुनन्दन भीमसेन का पौत्र हूँ। बर्बरीक मेरा नाम है। मैं उस दैत्य को मारने के लिये आया था। वह पापी दैत्य मारा गया; अतः अब पृथ्वी पर लौटा जा रहा हूँ। आप लोगों से किसी प्रकार मेरा कोई प्रयोजन नहीं है, क्योंकि मैंने सदा ब्रह्मचारी रहने का व्रत लिया है। यों कहकर बर्बरीक ने उस शिवलिंग का पूजन और साष्टांग प्रणाम किया । फिर उन सब कन्याओं के देखते-देखते ऊपर के मार्ग से चल दिया। बिल से बाहर आकर उसने पूर्व दिशा के मुख को प्रकाश युक्त देखा, फिर बड़े हर्ष के साथ वह विजय से मिला। उस समय तक विजय अपना सब कार्य पूरा कर चुके थे।
उन्होंने बर्बरीक से कहा–‘ वीरेन्द्र ! तुम्हारे प्रसाद से मैंने अनुपम सिद्धि प्राप्त की है। तुम दीर्घकाल तक जीओ, आनन्द करो, दान दो और विजयी बनो। इसीलिये साधु पुरुष साधुओं का ही संग करना चाहते हैं, क्योंकि सत्पुरुषों का संग सब दोषों को दूर करने की दवा है। मेरे होमकुण्ड में सिन्दूर के समान लाल रंग का सात्त्विक एवं अत्यन्त पवित्र भस्म है, उसे हाथ में भरकर ले लो । युद्धभूमि में इसे पहले छोड़ देने पर शत्रु के स्थान पर मृत्यु भी हो, (साक्षात् मृत्यु ही शत्रु बन कर आ जाय) तो उसके शरीर को भी यह नष्ट कर देगा। इस प्रकार शत्रुओं पर तुम्हें सुखपूर्वक विजय प्राप्त होगी।
बर्बरीक बोला—जो निष्काम भाव से किसी का उपकार करता है, वही साधु कहलाता है। जो किसी वस्तु की इच्छा रखकर उपकार करता है, उसकी साधुता में कौन गुण है।
अत: यह भस्म किसी दूसरे को दे दीजिए। मेरा इससे कोई प्रयोजन नहीं है। मैं तो केवल आपको प्रसन्न मुख देखना चाहता हूँ, इसके सिवा और कुछ नहीं।
तदनन्तर देवियों सहित देवताओं ने विजय का सम्मान करके उन्हें सिद्धैश्वर्य प्रदान किया और उनका नाम ‘सिद्धसेन’ रखा। इस प्रकार विजय ने अत्यन्त दुर्लभ सिद्धि प्राप्त की।
तत्पश्चात् कुछ काल बीतने पर पाण्डव लोग जूए में हार गये और विभिन्न तीर्थो में घूमते हुए उस शुभ तीर्थ में भी स्नान के लिये आये। वहाँ चण्डिका देवी का दर्शन करके मार्ग के थके-माँदे होने के कारण कहीं बैठ गए। पाँचों पाण्डवों के साथ द्रौपदी भी थी। उस समय चण्डिका का गण भी वहीं विराजमान था। बर्बरीक ने वहाँ पधारे हुए पाण्डव वीरों को देखा, परंतु वह उन्हें पहचानता नहीं था। पाण्डव भी उसे नहीं पहचानते थे; क्योंकि जन्म से लेकर अबतक पाण्डवों के साथ उसकी भेंट ही नहीं हुई थी।
पाण्डवो ने अपनी गठरी आदि वहीं खोल दीं और प्यास से पीड़ित होकर जल की ओर देखा। तब भीमसेन कुण्ड में पानी पीने के लिए घुसे । उस समय युधिष्ठिर ने उनसे कहा-‘ भीमसेन ! तुम कुण्ड से पानी निकालकर बाहर ही हाथ-पैर धो लो, उसके बाद जल पीना; अन्यथा तुम्हें बड़ा दोष लगेगा।’ भीमसेन के नेत्र प्यास से व्याकुल हो रहे थे। उन्होंने युधिष्ठिर की बातें बिना सुने ही जल पीने की इच्छा से कुण्ड में प्रवेश किया । जल देखकर उन्होंने वहीं पीने का निश्चय किया और शुद्धि के लिये मुख, दोनों हाथ और दोनों पैर धोये। भीमसेन जब इस प्रकार पैर थो रहे थे, उस समय सुहृदय ने ऊपर से यह सत्य वचन कहा-ओ दुर्मते! तुम यह क्या कर रहे हो? तुम्हारा विचार तो बड़ा पापपूर्ण है। अहो! तुम देवी के कुण्ड में हाथ, पैर और मुँह धो रहे हो। मैं देवी को सदा इसी जल से स्नान कराता हूँ। मल से दूषित जल को तो मनुष्य भी नहीं छूते, फिर देवता उसका स्पर्श कैसे कर सकते हैं? जब तुम इतने बड़े मूढ़ हो, तब तीर्थों में क्यों घूम रहे हो?’
भीमसेन ने कहा–क्रूर राक्षसाधम! तू क्यों ऐसी कठोर बातें कहता है? जल का दूसरा उपयोग ही क्या है? वह प्राणियों के भोग के लिये ही तो होता है? बड़े-बड़े मुनीश्वरों ने भी तीर्थों में स्नान का विधान किया है। अंगों को धोना ही तो स्नान कहा गया है। फिर तू मेरी निंदा क्यों करता है? यदि स्नान और अंग-प्रक्षालन न किया जाय तो धर्मात्मा पुरुष किसलिये पूर्त धर्म का अनुष्ठान करते हैं? क्यों बावड़ी, कूप और तड़ाग आदि बनवाते हैं?
सुहृदय बोला–निःसन्देह तुम्हारा यह कथन सत्य है कि मुख्य-मुख्य तीर्थों में स्नान करना चाहिये। ऐसी विधि है भी, परंतु जो नदी आदि चर तीर्थ हैं– जिनके जल बहते रहते हैं, उन्हीं में भीतर प्रवेश करके स्नान आदि करना चाहिये। कूप-सरोवर आदि स्थावर तीथों में तो बाहर खड़े होकर ही स्नानादि करना उचित है। स्थावर तीर्थों में भी वहीं भीतर प्रवेश करके स्नान करने का विधान है, जहाँ भक्त पुरुष देवता को स्नान कराने के लिये जल न लेते हों तथा जो सरोवर देवस्थान से सौ हाथ से भी अधिक दूर बनाया गया हो। उसके भीतर प्रवेश करने का भी यह एक क्रम है कि पहले बाहर ही दोनों पैर धोकर फिर कुण्ड में स्नान किया जाय, अन्यथा दोष बताया गया है। क्या तुमने ब्रह्माजी का कहा हुआ यह श्लोक नहीं सुना है?-
मल मूत्र पुरीष॑ च श्लेष्मनिष्ठीवितं तथा। … गण्डूषमप्सु मुज्चन्ति ये ते ब्रह्महभि: समा: ॥
“जो जलमें मल, मूत्र, विष्ठा, कफ, थूक और कुल्ला छोड़ते हैं, वे ब्रह्महत्यारों के समान हैं।’
इसलिये ओ दुराचारी ! तुम शीघ्र जल से बाहर निकल आओ । यदि तुम्हारी इन्द्रियाँ तुम्हारे काबू में नहीं हैं, तो तुम तीर्थों में किसलिये घूमते हो?
नादान! जिसके हाथ, पैर और मन भली भाँति संयम में हों और जिसके द्वारा समस्त क्रियाएँ निर्विकार भाव से की जाती हों, वही तीर्थ का फल पाता है। मनुष्य पुण्यकर्म के द्वारा यदि दो घड़ी भी जीवित रहे, तो वह उत्तम है। परंतु उभय लोकविरोधी पाप कर्म के साथ एक कल्प की भी आयु मिले, तो उसे न स्वीकार करे।
भीमसेन बोले-कौवों की तरह तेरी काय काय की कर्कश ध्वनि से मेरे तो कान बहरे हो गये। अब तू अपनी इच्छा के अनुसार यहाँ विलाप कर या चिन्ता के मारे सूख जा; मैं तो जल पीकर ही रहूँगा।
सुहदय ने कहा–मैं धर्म की रक्षा करने वाले क्षत्रियों के कुल में उत्पन्न हुआ हूँ, अत: किसी प्रकार भी तुम्हें पाप न करने दूँगा। हमारे इस कुण्ड से तो तुम शीघ्र ही बाहर निकल आओ नहीं तो इन ईंटों के टुकड़ों से तुम्हारा मस्तक चूर- चूर कर दूँगा। यों कहकर बर्बरीक ने ईटे उठा लिए और भीम के मस्तक को लक्ष्य करके फेंकना आरम्भ किया।
भीमसेन उसके प्रहार को बचाकर उछले और सरोवर से बाहर आ गए। फिर तो दोनों भयंकर पराक्रमी वीर एक-दूसरे को घुड़कते हुए आपस में गुथ गये। दोनों ही युद्धविद्या में पारंगत थे। अत: अपनी विशाल भुजाओं से युद्ध करने लगे। दो ही घड़ी में उस राक्षस के सामने पाण्डव भीमसेन दुर्बल पड़ने लगे। अंत में बर्बरीक ने भीमसेन को उठा लिया और जल में फेंकने के लिए समुद्र की ओर चल दिया। समुद्र के किनारे पहुँचने पर भगवान् शंकर ने आकाश में स्थित हो बर्बरीक से कहा–‘राक्षसों में श्रेष्ठ महाबली बर्बरीक! ये भरतकुल के रत्न और तुम्हारे पितामह भीमसेन हैं, इन्हें छोड़ दो। ये तीर्थयात्रा के प्रसंग से अपने भाइयों तथा द्रौपदी के साथ विचरते हुए इस तीर्थ में भी स्नान करने के लिये ही आये हैं। अत: तुम्हारे द्वारा सर्वथा सम्मान पाने के ही योग्य हैं।’
भगवान् शंकर का यह वचन सुनकर सहृदय रुका और बोल उठा—हाय! मुझे धिक्कार है। यह बड़े कष्ट की बात है, बड़े कष्ट की बात है, पितामह! मुझे क्षमा कीजिये, क्षमा कीजिये।’ उसे इस प्रकार शोक करते और बार-बार मोहित होते देख भीमसेन ने छाती से लगा लिया और स्नेह से मस्तक सूँघकर कहा– “वत्स! जन्मकाल से ही न तो हम तुम्हें पहचानते हैं न तुम हमको । केवल घटोत्कच तथा भगवान् श्रीकृष्ण से यह सुन रखा है कि तुम इसी तीर्थ में निवास करते हो। किंतु यह सब बात भी हमें भूल गयी थी, क्योंकि जो लोग अनेक प्रकार के दुःखों से दुःखी और मोहित होते हैं, उनकी सारी स्मरणशक्ति नष्ट हो जाती है। अतः: हम पर जो यह दुःख आया है, वह सब काल की प्रेरणा से प्राप्त हुआ है। बेटा! तुम शोक न करो। तुम्हारा इसमें तनिक भी दोष नहीं है, क्योंकि कुमार्ग पर चलनेवाला कोई भी क्यों न हो, क्षत्रिय के लिये दण्डनीय ही है। साधु क्षत्रिय को उचित है कि यदि कुमार्ग पर चले तो अपनी आत्मा को भी दण्ड दे। फिर पिता, माता, सुहदद, भ्राता और पुत्र आदि के लिये तो कहना ही क्या है?
मुझे आज बड़ा हर्ष प्राप्त हुआ है। मैं और मेरे पूर्वज धन्य हैं, जिनका पुत्र ऐसा धर्म और धर्मपालक है। तुम वर पाने के योग्य हो, मेरे तथा दूसरे सत्पुरुषों के द्वारा प्रशंसा पाने के अधिकारी हो। अतः यह शोक छोड़कर तुम्हें स्वस्थ हो जाना चाहिए।’ बर्बरीक बोला—पितामह! मैं पापी हूँ, ब्रह्महत्यारा से भी अधिक घृणा का पात्र हूँ। प्रशंसा के योग्य कदापि नहीं हूँ। प्रभो! न तो आप मेरी ओर देखें और न मेरा स्पर्श ही करें। ब्राह्मण लोग सभी पापों का प्रायश्चित्त बतलाते हैं; परंतु जो पिता-माताका भक्त नहीं है, उसके उद्धार का कोई उपाय नहीं । अतः जिस शरीर से मैंने पितामह को पीड़ा पहुँचायी है, उस अपने शरीर को आज मैं महीसागर संगम में त्याग दूँगा; जिससे अन्य जन्मों में भी ऐसा ही. पातकी न होऊँ। यों कहकर बलवान् बर्बरीक उछलकर समुद्र के भीतर चला गया। समुद्र भी यह सोचकर कांप उठा कि ‘मैं कैसे इसका वध करूँ’।
तदनन्तर सिद्धाम्बिका तथा चारों दिशाओं की देवियाँ रुद्रके साथ वहाँ आयीं और उसे हदय से लगाकर बोलीं-‘वीरेन्द्र! अनजान में किए हुए पाप से दोष नहीं लगता, यह बात शास्त्रों में बताई गई है। अतः तुम्हें इसके विपरीत कोई बर्ताव नहीं करना चाहिए। देखो, तुम्हारे पितामह भीम पुत्र-पुत्र पुकारते हुए तुम्हारे पीछे लगे हुए चले आ रहे हैं। तुम्हारी मृत्यु हो जाने पर वे स्वयं भी प्राण त्याग देनेको उत्सुक हैं। वीर! यदि इस समय तुम शरीर छोड़ोगे तो भीमसेन भी शरीर को त्याग देंगे। उस दशा में तुम्हें बड़ा भारी पातक लगेगा। अतः महामते ! तुम ऐसा जानकर अपने शरीर को धारण करो। थोड़े ही समय में देवकीनन्दन श्रीकृष्ण के हाथ से तुम्हारे शरीर का नाश होगा, ऐसा बताया गया है। वत्स! वे साक्षात् भगवान् विष्णु हैं और उनके हाथ से शरीर का नाश होना बहुत उत्तम (मुक्तिदायक) है। इसलिये तुम उस समय की प्रतीक्षा करो और हमारी बात मानो।’ देवियों के ऐसा कहने पर बर्बरीक उदास मन से लौट आया। ‘बर्बरीक चण्डिका के कार्य की सिद्धिके लिये बड़ा भारी युद्ध करेगा, इसलिये संसार में चण्डिल नाम से प्रसिद्ध और समस्त विश्व के लिये पूजनीय होगा।’ यों कहकर वहाँ आयी हुई सब देवियाँ अन्तर्धान हो गईं। भीमसेन भी बर्बरीक को साथ लेकर आए और अन्य पाण्डवों से भी यह सारा समाचार कह सुनाया। सुनकर सब पाण्डवों को बड़ा आश्चर्य हुआ। सबने बार-बार उसकी प्रशंसा की और आलस्य त्यागकर विधि के अनुसार तीर्थ-स्नान किया।
द कहते हैं–तदनन्तर पाण्डवों के वनवास का तेरहवाँ वर्ष व्यतीत हो जाने पर जब “उपप्लब्य’ नामक स्थान में सब राजा युद्ध के लिये एकत्र हो गये, तब महारथी पाण्डव भी युद्ध करने के लिये कुरुक्षेत्र में आकर स्थित हुए। दुर्योधन आदि कौरव भी वहाँ पहले से ही टिके हुए थे। उस समय भीष्मजी ने रथियों और अतिरथियों की गणना की थी। उसका सब समाचार गुप्तचरों द्वारा सुनकर राजा युधिष्ठिर ने अपने पक्ष के राजाओं के बीच भगवान् श्रीकृष्ण से कहा–‘देवकीनन्दन! पितामह भीष्म ने रथियों और अतिरथियों का वर्णन किया है, उसे सुनकर दुर्योधन ने अपने पक्ष के महारथियों से पूछा है कि “कौन वीर कितने समयमें सेना सहित पाण्डवों का वध कर सकता है?’ इसके उत्तर में पितामह भीष्म तथा कृपाचार्य ने एक मास में हम सबको मारने की प्रतिज्ञा की है। द्रोणाचार्य ने पन्द्रह दिनों में, अश्वत्थामा ने दस दिन में तथा सदा मुझे भयभीत करने वाले कर्ण ने छः दिन में सेनासहित पाण्डवों को मारने की घोषणा की है। अतः यही प्रश्न मैं अपने पक्ष के महारथियोंके सामने रखता हूँ-‘ कौन कितने समय में सेनासहित कौरवों को मार सकता है?’ राजा युथिष्ठिर का यह वचन सुनकर अर्जुन बोले–महाराज! भीष्म आदि महारथियों ने जो प्रतिज्ञा या घोषणा की है वह सर्वथा असंगत है; क्योंकि विजय और पराजय में पहले से किया हुआ निश्चय झूठा होता है। आपके पक्ष में भी जो वीर राजा हैं, वे युद्ध के लिये कमर कसकर रणभूमि में डटे हुए हैं।
देखिये-ये नरश्रेष्ठ काल के समान दुर्धर्ष हैं–द्रूपद, विराट, कैकेय, सात्यकि, दुर्जय वीर चेकितान, धृष्टद्युम्न, पुत्र सहित महा पराक्रमी घटोत्कच, महाधनुर्धर भीमसेन आदि तथा कभी किसी से परास्त न होने वाले भगवान् श्रीकृष्ण–ये सब आपके पक्ष में हैं। मैं तो समझता हूँ, इनमें से एक-एक वीर सारी कौरव सेना का संहार कर सकता है। इनके डर से कौरव इस प्रकार भागेंगे जैसे सिंह से डरे हुए मृग। बूढ़े भीष्म से, बूढ़े बाबा द्रोण और कृप से तथा अश्वत्थामा से अपने को क्या भय है? अथवा यदि चित्त की शान्ति के लिये आप जानना ही चाहते हैं, तो मेरी बात सुनिये-मैं अकेला ही युद्ध में सेना सहित समस्त कौरवों को एक दिन में नष्ट कर सकता हूँ।
अर्जुन की यह बात सुनकर घटोत्कच के पुत्र ने हँसते हुए कहा–महात्मा अर्जुन ने जो प्रतिज्ञा की है, वह मुझे नहीं सही जाती, क्योंकि इनके द्वारा दूसरे वीरों पर महान् आक्षेप हो रहा है। अतः अर्जुन और श्रीकृष्ण सहित आप सब लोग चुपचाप खड़े रहें, मैं एक ही मुहूर्त में भीष्म आदि सबको यमलोक में पहुँचा दूँगा । मेरे भयंकर धनुष को, इन दोनों अक्षय तूणीरों को तथा भगवती सिद्धाम्बिका के दिये हुए इस खड्ग को भी आप लोग देखें। ऐसी दिव्य वस्तुएँ मेरे पास हैं। तभी मैं इस प्रकार सबको जीतने की बात कहता हूँ। बर्बरीक का यह वचन सुनकर सब क्षत्रिय बड़े विस्मय को प्राप्त हुए। अर्जुन ने भी आश्वासन देने के कारण लज्जित होकर श्रीकृष्ण की ओर देखा। तब श्रीकृष्ण ने कहा–‘पार्थ! घटोत्कच के इस पुत्र ने अपनी शक्ति के अनुरूप ही बात कही है। इसके विषय में बड़ी अद्भुत बातें सुनी जाती हैं।
पूर्वकाल में इसने पाताल में जाकर नौ करोड़ पलाशी नामक दैत्यों को क्षणभर में मौत के घाट उतार दिया था।’
तत्पश्चात् यादवेन्द्र श्रीकृष्ण ने घटोत्कच के पुत्र से कहा–वत्स ! भीष्म, द्रोण, कृप, अश्वत्थामा, कर्ण और दुर्योधन आदि महारथियों के द्वारा सुरक्षित कौरव सेना को, जिस पर विजय पाना महादेवजी के लिये भी कठिन है, तुम इतना शीघ्र कैसे मार सकते हो? तुम्हारे पास ऐसा कौन-सा उपाय है? समस्त प्राणियों के अधीश्वर भगवान् वासुदेव के इस प्रकार पूछने पर सिंह के समान वक्षःस्थल, पर्वताकार शरीर तथा अतुलित बल से सम्पन्न एवं नाना प्रकार के आभूषणों से विभूषित बर्बरीक ने तुरंत ही धनुष चढ़ाया और उस पर बाण सन्धान किया। फिर उस बाण को उसने लाल रंग के भस्म से भर दिया और कान तक खींचकर छोड़ दिया। उस बाण के मुख से जो भस्म उड़ा, वह दोनों सेनाओं में सैनिकों के मर्मस्थलों पर गिरा । केवल पाँच पाण्डव, कृपाचार्य और अश्वत्थामा के शरीर से उसका स्पर्श नहीं हुआ। यह कर्म करके बर्बरीक ने पुनः सब लोगों से कहा-‘ आप लोगों ने देखा, इस क्रिया के द्वारा मैंने मरने वाले वीरों के मर्मस्थान का निरीक्षण किया है। अब उन्हीं मर्मस्थानों में देवीके दिये हुए तीक्ष्ण और अमोघ बाण मारूँगा, जिनसे ये सभी योद्धा क्षणभर में मृत्यु को प्राप्त हो जायेँगे। आप सब लोगों को अपने-अपने धर्म की सौगंध है, कदापि शस्त्र ग्रहण न करें। मैं दो ही घड़ी में इन सब शत्रुओं को तीखे बाणों से मार गिराऊँगा।’ यह सुनकर युधिष्ठिर आदि के चित्त में बड़ा विस्मय हुआ। वे सब लोग बर्बरीक को साधुवाद देने लगे, जिससे महान् कोलाहल छा गया। बर्बरीक ने ज्यों ही उपर्युक्त बात कही त्यों ही श्रीकृष्णने कुपित होकर अपने तीखे चक्र सेः मस्तक काट गिराया।
यह देख सबको बड़ा आश्चर्य हुआ। सब एक-दूसरे से कहने लगे-‘ अहो ! यह क्या हुआ ? घटोत्कच का पुत्र कैसे मारा गया?’ पाण्डव भी अन्य सब राजाओं के साथ आँसू बहाने लगे! घटोत्कच तो “हा पुत्र! हा पुत्र!’ कहता हुआ शोक से मूर्छित होकर गिर पड़ा। इसी समय सिद्धाम्बिका आदि चौदह देवियाँ वहाँ आ पहुँचीं। श्रीचण्डिका ने घटोत्कच को सान्त्वना देकर उच्चस्वर से कहा- “सब राजा सुनें। विदितात्मा भगवान् श्रीकृष्ण ने महाबली बर्बरीक का वध किस कारण से किया है, वह मैं बतलाती हूँ।
पूर्वकाल की बात है, मेरुपर्वत के शिखर पर सब देवता एकत्र हुए थे। उस समय भार से पीड़ित हुई यह पृथ्वी वहाँ गयी और सब देवताओं से बोली-‘ आपलोग मेरा भार उतारें।’ तब ब्रह्माजी ने भगवान् विष्णु से कहा–‘भगवन्! आप मेरी प्रार्थना सुनें। आप ही पृथ्वी का भार उतारें, इस कार्य में देवता आपका अनुसरण करेंगे।’ तब भगवान् विष्णु ने “तथास्तु’ कहकर ब्रह्माजी की प्रार्थना स्वीकार कर ली।
इसी समय ‘ सूर्यवर्चा’ नामक यक्षराज ने उठकर कहा–‘ आप लोग मेरे रहते हुए मनुष्यलोक में क्यों जन्म धारण करते हैं? मैं अकेला ही अवतार लेकर पृथ्वी के भारभूत सब दैत्यों का संहार करूँगा।’
सूर्यवर्चा के ऐसा कहने पर ब्रह्माजी कुपित होकर बोले–दुर्मते! पृथ्वी का यह महान् भार समस्त देवताओं के लिये भी दु:सह है, उसे तू मोहवश केवल अपने ही द्वारा साध्य बतलाता है। मूर्ख! पृथ्वी का भार उतारते समय जब युद्ध का आरम्भ होगा, उस समय श्रीकृष्ण के हाथ से तेरे शरीर का नाश होगा। इसमें संशय नहीं है। ब्रह्माजी के द्वारा ऐसा शाप प्राप्त होने पर सूर्यवर्चा ने भगवान् विष्णु से यह याचना की– भगवन्! यदि इस प्रकार मेरे शरीर का नाश होने वाला है, तो मैं एक प्रार्थना करता हूँ- जन्म से ही मुझे ऐसी बुद्धि दीजिये, जो सब अर्थों को सिद्ध करने वाली हो।’
यह सुनकर भगवान् विष्णु ने देवसभा में कहा–ऐसा ही होगा। देवियाँ तुम्हारे मस्तक की पूजा करेंगी। तुम पूज्य हो जाओगे।
भगवान् के ऐसा कहने पर सूर्यवर्चा तथा आप सब देवता भी इस पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए। सूर्यवर्चा ही, यह घटोत्कच का पुत्र था, जो मारा गया है। अतः समस्त राजाओं को श्रीकृष्ण में दोष नहीं देखना चाहिये।
श्रीभगवान् बोले-राजाओ ! देवी ने जो कुछ कहा है, वह निःसन्देह वैसा ही है। मैंने देवसमाज में सूर्यवर्चा को जो वर दिया था, उसका स्मरण करके ही गुप्तक्षेत्र में देवी की आराधना के लिये मैंने इसे नियुक्त कर दिया था। राजाओं से ऐसा कहकर भगवान् श्रीकृष्ण फिर चण्डिका से बोले-देवि! यह भक्त का मस्तक है। इसे अमृत से सींचो और राहु के सिर की भाँति अजर-अमर बना दो। देवी ने वैसा ही किया।
जीवित होने पर उस मस्तक ने भगवान् श्रीकृष्ण को प्रणाम किया और कहा— मैं युद्ध देखना चाहता हूँ। इसके लिए मुझे अनुमति मिले ।
तब भगवान् श्रीकृष्ण ने मेघ के समान गम्भीर वाणी में कहा– वत्स! जब तक यह पृथ्वी, नक्षत्र, चन्द्रमा तथा सूर्य रहेंगे, तब तक तुम सब लोगों के द्वारा पूजनीय होओगे। अब तुम इस पर्वत शिखर पर चढ़कर वहाँ रहो। वहीं से होने वाले युद्ध को देखना।’
भगवान् वासुदेव के ऐसा कहने पर समस्त देवियाँ आकाश में जाकर अन्तर्धान हो गईं। बर्बरीक का मस्तक पर्वत के शिखर पर स्थित हो गया। उसका शरीर जमीन पर था, उसका यथाविधि संस्कार कर दिया गया। मस्तक का कोई संस्कार नहीं हुआ। तत्पश्चात् कौरव और पाण्डवों की सेना में भयानक संग्राम छिड़ गया जो लगातार अठारह दिनों तक चला। युद्ध में द्रोण और कर्ण आदि सब वीर मारे गये। अठारह दिनों बाद निर्दयी दुर्योधन भी मारा गया। तब अपने बन्धु- बान्धवों के बीच में धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान् श्रीगोविन्द से कहा–‘ पुरुषोत्तम ! इस महान् संग्राम- सागर से आपने ही हमलोगों को पार उतारा है। हे नाथ! हे हरे! हे पुरुषोत्तम ! आपको नमस्कार है।’ भीमसेन बहुत भोले थे। उन्हें धर्मराज की यह बात कुछ भारी लगी और उन्होंने तनिक असहिष्णुता के साथ युधिष्ठिर से कहा–‘राजन्! धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारने वाला तो यह मैं भीम हूँ। आप मेरा तिरस्कार करके ‘पुरुषोत्तम’, “पुरुषोत्तम’ कहकर कृष्ण की इतनी बड़ाई क्यों कर रहे हैं? धृष्टयुम्न, अर्जुन, सात्यकि और मैं, जिन लोगों ने युद्ध में पराक्रम दिखाकर विजय पायी, उन्हें छोड़कर आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?’
भीमसेन की यह अनुचित बात सुनकर अर्जुन से नहीं रहा गया। अर्जुन बोले, ‘ भाई भीमसेन जी! राम! राम! आप ऐसा बिलकुल न कहिये, आप जनार्दन श्रीकृष्ण को यथार्थतः जानते नहीं हैं। मेरे, आपके या किसी भी अन्य वीर के द्वारा शत्रु का वध नहीं किया गया है। युद्ध के समय मैं सदा देखता था कि मेरे आगे- आगे कोई एक पुरुष शत्रुओं को मारता हुआ चला करता था। मुझे पता नहीं, वह कौन था।’
अर्जुन की बात सुनकर भीमसेन बोले—अर्जुन! तुम निश्चय ही बड़े भ्रम में पड़े हो। भला, युद्ध में दूसरा कौन शत्रुओंको मारता। तथापि यदि तुम्हें विश्वास न हो तो चलो, पर्वत शिखर पर स्थित पौत्र बर्बरीक के मस्तकसे पूछ लें, उसने तो सारा युद्ध देखा ही है। इतना कहकर भीम ने वहाँ जाकर बर्बरीक से पूछा—’बेटा! बताओ, इस युद्ध में कौरवों को किसने मारा है?’
बर्बरीक ने कहा-‘मैंने तो शत्रुओं के साथ केवल एक पुरुष को युद्ध करते देखा है। उस पुरुष के बायीं ओर पाँच मुख थे और दस हाथ थे, जिनमें वह शूल आदि आयुध धारण किए हुए था। उसके दाहिनी ओर एक मुख और चार भुजाएँ थीं, जो चक्र आदि अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित थीं। उसके बायीं ओर के मस्तक जटाओं से सुशोभित थे और दाहिनी ओर मस्तक पर मुकुट झलमला रहा था। उसने बायीं ओर भस्म धारण कर रखी थी तथा दायीं ओर चन्दन लगा रखा था। बायीं ओर चन्द्रकला शोभा पा रही थी और दायीं ओर कौस्तुभमणि की छटा छा रही थी। उस पुरुष के अतिरिक्त कौरववाहिनी का विनाश करने वाले किसी अन्य पुरुष को मैंने नहीं देखा।’ बर्बरीक के ऐसा कहते ही आकाश-मण्डल उद्घाटित हो उठा। उससे पुष्पवृष्टि होने लगी। देवताओं की दुन्दुभियाँ बज उठीं और ‘साधु-साधु’ की ध्वनि से आकाश भर गया। इससे भीमसेन लज्जित होकर लंबी साँस लेने लगे।
तदनन्तर भीमसेन ने तन, मन, वचन से भगवान् श्रीकृष्ण को प्रणाम करके कहा- “केशव! मैंने जन्म से लेकर अब तक जितने भी अपराध किए हैं, उन सबके लिए तुम मुझे क्षमा करो। हे पुरुषोत्तम! हे नाथ! मैं मूर्ख हूँ, तुम मेरे प्रति प्रसन्न होओ।’ भगवान् ने हँसकर कहा—’अच्छी बात है, सब क्षमा किए।’ त
दनन्तर भीमको साथ लेकर भगवान् श्रीकृष्ण ने बर्बरीक के समीप जाकर कहा– “तुम को इस क्षेत्र का त्याग नहीं करना चाहिये। हम लोगों से जो अपराध हो गए हों, उन्हें क्षमा करना।’ भगवान् के ऐसा कहने पर बर्बरीक ने उन्हें प्रणाम किया और प्रसननतापूर्वक वह अपने अभीष्ट स्थान को चला गया।
भगवान् वासुदेव भी अवतारसम्बन्धी सब कार्य पूर्ण करके परमधाम को पधारे।
ब्राह्मणों ! इस प्रकार मैंने तुम्हें बर्बरीक के जन्मका वृत्तान्त बतलाया है और गुप्तक्षेत्र का भी संक्षेप से वर्णन किया है। इस क्षेत्र का प्रमाण ब्रह्माजी ने सात कोस का बताया है। यह सम्पूर्ण मनोरथों को सिद्ध करने वाला है । इस प्रकार परम पवित्र महीसागर- संगम का वर्णन किया गया। जो इसका श्रवण अथवा पाठ करता है, वह सब पापों से मुक्त हो जाता है। यह प्रसंग बहुत ही पवित्र, पुण्यदायक, यश की वृद्धि करने वाला तथा पाप को हर लेनेवाला है। जो पुरुष भक्तिपूर्वक इसका श्रवण करता है, वह पुण्य का भागी होता है और प्राणनाश के पश्चात् भगवान् शिवके परम-धाम में जाता है। जो मनुष्य मन और इन्द्रियों को संयममें रखकर पवित्र हो इस परम धन्य, यशोदायक, निश्चय पुण्यप्रद, मनुष्य मात्र के पाप हारक तथा उत्तम मोक्षदायक पुराण का प्रतिदिन श्रवण करता है, वह सूर्यमण्डल को वेधकर भगवान् विष्णु के परमधाम को प्राप्त होता है।
स्रोत – श्रीमद स्कंद पुराण






