आज का पंचांग

Sunday, 07 June 2026 | New Delhi

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⛔ Rahu Kaal 15:49 – 17:33
⛔ Gulika Kaal 14:04 – 15:49
✅ Brahma Muhurta 03:53 – 04:38
✅ Abhijit Muhurta 11:52 – 12:48

भरत के द्वारा स्वप्न में अपशकुन देखना

श्री सीतारामचंद्राभंयम नमः – एकोनसप्ततितम : सर्ग:

भरत को दुःखी देख मित्रो द्वारा प्रसन्न करने का प्रयास, तथा उनके पूछने पर अपने देखे हुए भयंकर दुःस्वप्न का वर्णन करना।

जिस रात में दूतो ने उस नगर में प्रवेश किया था, उससे पहली रात में भरत ने भी एक अप्रिय स्वप्न देखा था। रात बीतकर प्रायः सवेरा हो चला था। तभी उस अप्रिय स्वप्नं को देखकर राजाधिराज दशरथ के पुत्र भरत मन ही मन बहुत संतप्त हुए।

उन्हें चिंतित जान उनके अनेक प्रियवादी मित्रो ने उनका मानसिक क्लेश दूर करने की इच्छा से एक गोष्ठी की और उसमे अनेक प्रकार की बातें करने लगे। कुछ लोग वीणा बजाने लगे। दूसरे लोग उनके चित्त की शांति के लिए नृत्य करने लगे। दूसरे मित्रो ने नाना प्रकार के नाटकों का आयोजन किया, जिनमे हास्य रस की प्रधानता थी।

किन्तु रघुकुल भूषण महात्मा भरत उन प्रियवादी मित्रो की गोष्ठी में हास्य विनोद करने पर भी प्रसन्न नहीं हुए। तब मित्रो से घिरकर बैठे हुए एक प्रिय मित्र ने मित्रो के बीच विराजमान भरत से पूछा की

मित्र – सखे! तुम आज प्रसन्न क्यों नहीं होते हो?

भरत ने उत्तर दिया – मित्र ! जिस कारण से मेरे मन में यह दीन भावना आयी है। सपने में क्या क्या देखा, उसे बताता हूँ सुनो !

मेने आज स्वप्न में अपने पिता जी को देखा है। उनका मुख मलिन था बाल खुले हुए थे। और वे पर्वत की छोटी से ऐसे गंदे गड्ढ़े में गिर पड़े। जिसमे गोवर भरा हुआ था मेने उन्हें गोवर में तैरते हुए देखा था। वे अंजलि में तेल लेकर पि रहे थे और उन्होंने हॅसते हुए तिल और भात खाया। फिर उनके पूरे शरीर में तेल लगाया गया। फिर वे सिर नीचे किये तेल में गोते लगाने लगे।

स्वप्न में मेने यह भी देखा की समुद्र सूख गया है। सूर्य और चन्द्रमा पृथ्वी पर गिर पड़े है। पूरी पृथ्वी उपद्रव से ग्रस्त और घने अंधकार से आच्छादित सी हो गयी है। महाराज के काम में आने वाले हाथी का दाँत टूट फुट गया है। पहले से प्रज्ज्वलित अग्नि सहसा बुझ गयी है। मेने यह भी देखा है की पृथ्वी फट गयी है, नाना प्रकार के वृक्ष सूख गए है। पर्वत ढह गए है और उनसे धुआं निकल रहा है। मेने देखा कि महाराज काले लोहे की चौकी पर बैठे है। उन्होंने काला वस्त्र डाल रखा है। उनके पीछे भी काले वस्त्र पहने काली स्त्रियाँ खड़ी हुयी है और उनके ऊपर प्रहार करती है। धर्मात्मा राजा दशरथ लाल फूलो की माला पहने और लाल चन्दन लगा कर गधे जुते हुए रथ पर बैठकर बड़ी तेज़ी से दक्षिण दिशा की और चले जा रहे है।

लाल वस्त्र धारण करने वाली स्त्री जिसका मुँह बड़ा और फटा हुआ राक्षसी सी प्रतीत होती है महाराज को खींचे लिए जा रही थी।
इस प्रकार इस रात्रि में इस प्रकार का भयानक स्वप्न देखा है। इसका फल यह होगा की मैं, शत्रुघन्न, श्री राम, लक्ष्मण या राजा दशरथ इनमे से किसी की अवश्य मृत्यु होगी। जो मनुष्य गधे जुते हुए रथ पर दिखाई देता है तो शीघ्र ही उसकी चिता का धुआँ दिखाई देने में आता है।

यही कारण है की में दुखी हो रहा हु। और आप लोगो की बातो पर ध्यान नहीं दे प् रहा हु। में भय का कोई कारण नहीं देखता हु फिर भी भयभीत हु। पता नहीं क्यों मेरा स्वर बदल गया है, मेरी कांति भी फीकी पड़ गयी है और में अपने आप से घृणा करने लगा हूँ। परन्तु इस सबका कारण क्या है, यह मेरी समझ में नहीं आता।

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