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प्रेम का अर्थ क्या है? प्रेम के कितने प्रकार है?

Blog – प्रेम का अर्थ – प्रेम या भक्ति का अर्थ केवल ईश्वर भक्ति से ही नहीं है। मान लीजिये प्रेम करने वाला एक है वह आप है, परन्तु प्रेम के पात्र अनेक है जिनसे आप प्रेम करते है। प्रेम एक सीमा से ऊपर हो जाता है तब वह भक्ति बन जाता है।

प्रेम का अर्थ क्या है? प्रेम के कितने प्रकार है?
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प्रेम के प्रकार –

  1. जब हम किसी के निस्वार्थ भाव से शुभ चिंतक होते है, तब हम उसके प्रेमी होते है।
  2. जब हम किसी वस्तु से प्रेम करते है तो उसे आसक्ति कहते है।
  3. भाई, बहन और मित्रो के बीच प्रेम को प्रीति कहते है।
  4. पर जो हमसे बड़ा है, श्रेष्ठ है उससे प्रेम करना भक्ति है। इसलिए गुरु से प्रेम करना गुरु भक्ति, राष्ट्र से प्रेम राष्ट्र भक्ति, परमात्मा से प्रेम, परम भक्ति क्युकी परमात्मा अर्थात ईश्वर से श्रेष्ठ कोई नहीं है वह सर्वश्रेष्ठ है।

 

नारद भक्ति-सूत्र’ में कहा गया है कि ‘परमात्मा’ के प्रति परम प्रेम को भक्ति कहते हैं। विस्तार से पढ़े कि भक्ति किसे कहते है?

इसलिए कोई ऐसा कार्य जो निस्वार्थ भाव से किसी सम्मानीय व्यक्ति के लिए किया जाए वह भी भक्ति है। भक्ति शब्द भक्त शब्द से बना है जिसका अर्थ है सेवक या दास। इसलिए माता की सेवा को मातृभक्ति, पिता की सेवा को पितृभक्ति, गुरु की सेवा को गुरुभक्ति, शासन की सेवा को राज भक्ति, और प्रभु की सेवा को ईश्वर भक्ति कहते है।

अर्थात समाज में व्यक्ति अपने विकास के साथ साथ जैसे-जैसे सम्बन्ध बनाता है और वे सम्बन्ध लगातार बदलते रहते है तो वैसे ही प्रेम के प्रकार भी बदलते रहते है।

केवल एक सम्बन्ध है, जो कभी नहीं बदलता, न उसका प्रेम बदलता है, वह है ईश्वर और व्यक्ति का सम्बन्ध। यही सच्चे प्रेम की परिभाषा है, यही सनातन सत्य है। इस प्रकार के प्रेम का अनुसन्धान या खोज, व्यक्ति को स्वयं के ह्रदय में करनी होती है।


FAQs –

शास्त्रों के अनुसार प्रेम क्या है?

‘नारद भक्ति-सूत्र’ में कहा गया है कि ‘परमात्मा’ के प्रति परम प्रेम को भक्ति कहते हैं। अर्थात के बढ़ने पर उसे भक्ति कहा जाता है।

सच्चे प्रेम की पहचान क्या है?

निस्वार्थ भाव अर्थात बिना किसी इच्छा से किया गया प्रेम ही सत्य प्रेम कहा जा सकता है।

प्रेम और प्यार में क्या अंतर है?

प्रेम और प्यार दोनों शब्द भावनाओं को व्यक्त करने के लिए प्रयोग किए जाते हैं, लेकिन इनमें कुछ अंतर हैं, प्रेम हिंदी और संस्कृत शब्द है, जबकि प्यार उर्दू शब्द है। सत्य प्रेम के लिए निस्वार्थ भाव होना आवश्यक है, जबकि सच्चा प्यार छल या भ्रम है, जिसमे स्वार्थ छुपा हुआ रहता है।

श्री कृष्ण के अनुसार प्रेम क्या है?

निस्वार्थ भाव से परम लक्ष्य को प्राप्त करना ही प्रेम है।

इस ज्ञान का कुछ स्रोत है –

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