सुन्द-उपसुन्द की कथा फिर अर्जुन को वनवास

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अज्ञातवास समाप्त होने के बाद वो सब वापस इन्द्रप्रस्थ लौट आते हैं। इन्द्रप्रस्थ में राज्य पाकर धर्मराज युधिष्ठिर अपने भाइयों और द्रोपदी के साथ सुख पूर्वक रहने लगे। एक दिन की बात है जब सभी पाण्डव राज्यसभा में बैठे थे तभी नारद मुनि वहां पहुंचे। पांडवो ने नारद मुनि का आदर सत्कार किया, वहां द्रोपदी भी आई और नारद मुनि का आर्शीवाद लेकर चली गई।

द्रोपदी के जाने के पश्चात नारद ने पाण्डवों से कहा की पाण्डवों आप पांच भाइयों के बीच द्रोपदी मात्र एक पत्नी है, इसलिए तुम लोगों को ऐसा नियम बना लेना चाहिए ताकि आपस में कोई झगड़ा ना हो। क्योंकि एक स्त्री को लेकर भाइयों में झगडे मौत का कारण भी बन जाते है। ऐसा कहकर नारद मुनि उन्हें एक कथा सुनाई –

नारद ऋषि के द्वारा सुन्द-उपसुन्द की कथा –

महाभारत आदि पर्व के ‘विदुरागमन राज्यलम्भ पर्व’ के अंतर्गत अध्याय 208 के अनुसार सुन्द-उपसुन्द के तपस्या की कथा का वर्णन इस प्रकार है-

प्राचीन समय की बात है। कश्यप ऋषि के दो प्रमुख पुत्र हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्क्ष थे। हिरण्यकशिपु के वंश में निकुंभ नामक एक असुर उत्पन्न हुआ था, जिसके सुन्द और उपसुन्द नामक दो पराक्रमी पुत्र सुन्द और उपसुन्द दो असुर भाई थे।  इनकी कथा रामायण में आयी है। बड़े होकर बहुत बलवान हुए। उनकी मति सदा एक सी रहती थी। दोनों के बारे में ऐसा कहा जाता है दोनों दो जिस्म एक जान हैं। उन्होंने त्रिलोक जीतने की इच्छा से विधिपूर्वक दीक्षा ग्रहण करके तपस्या प्रारंभ की। कठोर तप के बाद ब्रह्मा जी प्रकट हुए। दोनों भाईयों ने अमर होने का वर मांगा। तब ब्रह्मा कहा वह अधिकार तो सिर्फ देवताओं को है। तुम कुछ और मांग लो। तब दोनों ने कहा कि हम दोनों को ऐसा वर दें कि हम सिर्फ एक- दुसरे के द्वारा मारे जाने पर ही मरें। ब्रह्रा जी ने दोनों को वरदान दे दिया। दोनों भाईयों ने वरदान पाने के बाद तीनों लोको में कोहराम मचा दिया। सभी देवता परेशान होकर ब्रह्मा की शरण में गए। तब ब्रह्मा जी ने विश्वकर्मा से एक ऐसी सुन्दर स्त्री बनाने के लिए कहा जिसे देखकर हर प्राणी मोहित हो जाए।

तिलोत्तमा कश्यप और अरिष्टा की कन्या जो पूर्वजन्म में ब्राह्मणी थी और जिसे असमय स्नान करने के अपराध में अप्सरा होने का शाप मिला था। एक दूसरी कथा के अनुसार यह कुब्जा नामक स्त्री थी जिसने अपनी तपस्या से वैकुंठ पद प्राप्त किया।

एक दिन दोनों भाई एक पर्वत पर आमोद-प्रमोद कर रहे थे। तभी वहां तिलोतमा कनेर के फूल तोडऩे लगी। दोनों भाई उस पर मोहित हो गए। उसे देखते ही दोनों राक्षस उसे पाने के लिये आपस में लड़ने लगे और दोनों एक दूसरे द्वारा मारे गए।

यह कहानी सुनाते हुए नारदजी ने युधिष्ठिर से कहा कि –“प्रिय युधिष्ठिर आप पांच भाई हैं और रानी द्रोपदी आप पांचो भाइयों की पत्नी है ऐसे में एक स्त्री भाइयों में युद्ध करा सकती है, इसलिए आप लोग रानी द्रोपदी के साथ रहने का नियम क्यों नहीं बांध लेते, और जो भी इस नियम का उलंघन करे उसे 12 वर्ष का वनवास दंड स्वरूप दे दीजियेगा, जिससे आप में एक स्त्री की वजह से कभी लड़ाई ना हो सकेगी”. ऐसा कहकर नारदजी वहाँ से प्रस्थान कर गए. उनके जाते ही पाँचों पांडवों ने उनकी राय स्वीकार की और उन्होंने द्रोपदी के साथ रहने का नियम बना लिया.

तब पाण्डवों ने उनकी प्रेरणा से यह प्रतिज्ञा की एक नियमित समय तक हर भाई द्रोपदी के पास रहेगा। एकान्त में यदि कोई एक भाई दूसरे भाई को देख लेगा तो उसे बारह वर्ष के लिए वनवास होगा। पांचों पांडवो के ​बीच यह नियम निर्धारित था कि द्रौपदी एक साल तक केवल एक पांडव की पत्नी होगी. यह नियम युधिष्ठिर ने बनाया था. जिसके अनुसार यदि द्रौपदी समय सीमा के भीतर कक्ष में किसी एक पांडव के साथ हैं, तो दूसरा कोई भी भाई उस कक्ष में एक साल तक प्रवेश नहीं कर सकता. पाण्डव द्रोपदी के पास नियमानुसार रहते।

फिर एक दिन अर्जुन को वनवास (Arjun Vanvas in Mahabharata)-

किन्तु, नियति का खेल कुछ और ही था। फिर एक घटना घटित हुई, जिसने अर्जुन के जीवन को बदलकर रख दिया. एक दिन की बात है लुटेरो ने किसी ब्राह्मण की गाय लुट ली और उन्हे लेकर भागने लगे। वह ब्राह्मण दुखी होकर सहायता के लिए भागा तो बाहर अर्जुन को टहलते हुए देखा,  और करूण रूदन करने लगा।

ब्राह्मण ने कहा –  हे! पाण्डव तुम्हारे राज्य में मेरी गाय छीन ली गई है। अगर तुम अपनी प्रजा की रक्षा का प्रबंध नहीं कर सकते तो तुम नि:संदेह पापी हो।

लेकिन अर्जुन के सामने अड़चन यह थी कि जिस कमरे में राजा युधिष्ठिर द्रोपदी के साथ बैठे हुए थे। उसी कमरे में उनके अस्त्र-शस्त्र थे। एक ओर कौटुम्बिक नियम और दुसरी तरफ ब्राह्मण की करूण पुकार। तब अर्जुन ने प्रण किया की मुझे इस ब्राह्मण की रक्षा करनी है चाहे फिर मुझे इसका प्रायश्चित क्यों ना करना पड़े?

उसके बाद अर्जुन राजा युधिष्ठिर के घर में नि:संकोच चले गए। राजा से अनुमति लेकर धनुष उठाया और आकर ब्राह्मण से बोले ब्राह्मण देवता थोड़ी देर रूकिए में अभी आपकी गायों को आपको लौटा देता हूं। अर्जुन ने बाणों की बौछार से लुटेरों को मारकर गाय ब्राह्मण को सौंप दी।

उसके बाद अर्जुन ने आकर युधिष्ठिर से कहा। मैंने एकांत ग्रह में अकार अपनी प्रतिज्ञा तोड़ दी इसलिए मुझे वनवास पर जाने की आज्ञा दें। युधिष्ठिर ने कहा तुम मुझ से छोटे हो और छोटे भाई यदि अपनी स्त्री के साथ एकांत में बैठा हो तो बड़े भाई के द्वारा उनका एकांत भंग करना अपराध है। लेकिन जब छोटा भाई यदि बड़े भाई का एकांत भंग करे तो वह क्षमा का पात्र है।

अर्जुन ने कहा आप ही कहते हैं धर्म पालन में बहानेबाजी नहीं करनी चाहिए। उसके बाद अर्जुन ने वनवास की दीक्षा ली और वनवास को चल पड़े।

आगे की भाग में – वनवास का दौरान अर्जुन का उलूपी से विवाह और उनका पुत्र इरावन, फिर उनका चित्रांगदा से विवाह और उनसे पुत्र बब्रुवाहन।

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