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Sunday, 07 June 2026 | New Delhi

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तितिक्षा क्या है? Forbearance

संस्कृत में – तितिक्षा= हिंदी में – सहनशक्ति 

वेदांत सार के अनुसार – तितिक्षा का अर्थ गर्मी और ठंड में व्यक्ति का समान भाव से धीरज रखना है।
Titiksha – The name of tolerating happiness and sorrow calmly is Titiksha.

तितिक्षा का अर्थ :

  1. कष्ट सहने की शक्ति, जैसे सुख-दु:ख, मान-अपमान, शीत-उष्ण आदि।
  2. वह सहनशक्ति जिसमे प्रतिकार / बदला लेने की भावना न हो।
  3. सुख और दुख को शान्त भाव से सहन करने का नाम तितिक्षा है
  4. वह क्षमा दान जिसको देने के बाद मन में पश्चाताप न हो।

“स्वामी विवेकानन्द” ने आत्मानुभूति की सीढ़ियां में कहा है :- बिना विरोधी विचार या बिना मानसिक पीडा या बिना पश्चाताप की अनुभूति के कष्टो के प्रति सहनशीलता तितिक्षा है।

सद्गुरु स्वामी शंकराचार्य जी ने विवेक चूड़ामणि में भी तितिक्षा के बारे में बताया है।

सहनं सर्वदुःखानाप्रतीकारपूर्वकम।
चिंताविलापरहितं सा तितिक्षा निगद्यते।।

अर्थ – चिंता और शोक से रहित होकर बिना किसी प्रकार का प्रतिकार किए सब प्रकार के कष्टों को सहन करने को तितिक्षा कहा गया है।

सुख और दुख को शान्त भाव से सहन करने का नाम तितिक्षा है जो उपनिषदों के अनुसार यह आत्मसाक्षात्कार के लिये एक आवश्यक गुण है। यहाँ तितिक्षा का अर्थ निराश व्यक्ति की सहनशक्ति से नहीं बल्कि जगत् के परिर्वतनशील स्वभाव को अच्छी प्रकार समझ लेने से है। विवेकी पुरुष में यह सार्मथ्य आ जाती है कि सुख में न तो हर्ष से झूमता है और न दुख में अत्यन्त विषाद अर्थात ऐसा व्यक्ति में आंतरिक और बाहरी रूप से पीड़ित हुए बिना अप्रिय को सहने की क्षमता है।

बहुत बार, लोग तितिक्षा की व्याख्या चीजों के साथ करने के रूप में करते हैं। इसका अर्थ है बिना विरोध और प्रतिशोध के परिस्थितियों का सामना करना। अगर मैं इसे बाहर से सहता हूं, लेकिन भीतर से इसका विरोध करता हूं, तो यह तितिक्षा नहीं है। प्रकृति में ऐसी कई चीजें हैं जिन पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है। इसलिए तितिक्षा को विकसित करना आवश्यक है ताकि अप्रिय परिस्थितियों में व्यक्ति विचलित न हों।

तितिक्षा को भगवान श्री कृष्ण ने श्रीमदभगवद गीता में अध्याय दो के श्लोक 15 में बताया है।

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते।।2.15।।

स्वामी तेजोमयानंद के अनुसार व्याख्या – हे पुरुषश्रेष्ठ ! दुख और सुख में समान भाव से रहने वाले जिस धीर पुरुष को ये व्यथित नहीं कर सकते हैं वह अमृतत्व (मोक्ष) का अधिकारी होता है।। ।।2.15।।

Source – Gitasupersite

इसी को ध्यान में रखकर भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस प्रकार की तितिक्षा से सम्पन्न व्यक्ति मोक्ष का अधिकारी बन जाता है। तितिक्षा का अर्थ शीतोष्णादि द्वन्द्वों में जिसका मन समभाव में स्थित रहता है वह धीर पुरुष मोक्ष का अधिकारी होता है।

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