सनत्कुमार नन्दिकेश्वर जी से बोले — महाभाग योगीन्द्र ! आपने भगवान् शिव तथा दूसरे देवताओं के पूजन में लिङ्ग और वेर के प्रचार का जो रहस्य विभागपूर्वक बताया है, वह यथार्थ है।

इसलिये लिङ्ग और वेर की आदि उत्पत्ति का जो उत्तम वृत्तान्त है, उसी को मैं इस समय सुनना चाहता हूँ। लिङ्ग के प्राकट्य का रहस्य सूचित करने वाला प्रसङ्ग मुझे सुनाइये।
इसके उत्तर में नन्दिकेश्वर ने भगवान् महदेव के निष्कल स्वरूप लिङ्ग के आविर्भावि का प्रसङ्ग सुनाना आरम्भ किया।
उन्होंने ब्रह्मा तथा विष्णु के विवाद, देवताओं की व्याकुलता एवं चिन्ता, देवताओं का दिव्य कैलास-शिखर पर गमन, उनके द्वारा चन्द्रशेखर महदेव का स्तवन, देवताओं से प्रेरित हुए महदेवजी का ग्रहण और विष्णु के विवाद-स्थल में आगमन तथा दोनों के बीच में निष्कल आदि-अन्तरहित भीषण अग्निस्तम्भ के रूप में उनका आविर्भाव आदि प्रसङ्गों की कथा कही।
तदनन्तर श्रीब्रह्मा और विष्णु दोनों के द्वारा उस ज्योतिर्मय स्तम्भ की ऊँचाई और गहराई का थाह लेने की चेष्टा एवं केतकी-पुष्प के शाप-वरदान आदि के प्रसङ्ग भी सुनाये। (अध्याय ५—८ तक)
नन्दिकेश्वर कहते हैं — तदनंतर वे दोनों — ब्रह्मा और विष्णु भगवान् शंकर को प्रणाम करके दोनों हाथ जोड़ उनके दायें-बायें भाग में चुपचाप खड़े हो गये।
फिर, उन्होंने वहाँ सदावत् प्रकट पूजनीय महादेवजी को श्रेष्ठ आसन पर स्थापित करके पवित्र पुष्प-वस्त्रादि द्वारा उनका पूजन किया।
दीर्घकाल तक अविकृतभाव से सुस्थिर रहने वाली वस्तुओं को ‘पुष्प-वस्त्र’ कहते हैं और अल्पकाल तक ही टिकने वाली क्षणभङ्गुर वस्तुओं को ‘प्राकृत वस्त्र’ कहलाती हैं।
इस तरह वस्तु के ये दो भेद जानने चाहिए। (किन्तु पुष्प-वस्त्रादि से उन्होंने भगवान् शिव का पूजन किया, यह बताया जाता है —) हार, नूपुर, केयूर, किरिट, मणिमय कुण्डल, यज्ञोपवीत, उत्तरीय वस्त्र, पुष्प-माला, रेश्मी वस्त्र, हार, मुद्रिका, पुष्प, ताम्बूल, कपूर, चन्दन एवं अगुरु का अनुलेप, धूप, दीप, क्षेत्रत्र, व्यजन, ध्वजा, चैवर तथा अन्यान्य दिव्य उपहारों द्वारा, जिनका वैभव वाणी और मन की पहुँच से परे था, जो केवल पण्डितों (परमाला) के ही योग्य थे और जिन्हें पशु (बन्ध जीव) कदापि नहीं पा सकते थे, उन दोनों ने अपने स्वामी महेश्वर का पूजन किया।
सबसे पहले वहाँ ब्रह्मा और विष्णु ने भगवान् शंकर की पूजा की। इससे प्रसन्न हो भक्तिपूर्वक भगवान् शिव ने वहाँ नम्रभाव से खड़े हुए उन दोनों देवताओं को मुस्कुराकर कहा —
महेश्वर बोले — पुत्रो ! आज का दिन एक महान् दिन है। इसमें तुम्हारे द्वारा जो आज मेरी पूजा हुई है, इससे मैं तुम लोगों पर बहुत प्रसन्न हूँ। इसी कारण यह दिन परम पवित्र और महान्-से-महान् होगा। (आज की यह तिथि ‘शिवरात्रि’ के नाम से विख्यात होकर मेरे लिये परम प्रिय होगी। इसके समय में जो मेरे लिङ्ग (निर्बल — अज्ञात-आकृति से रहित निराकार स्वरूप के प्रतीक) वेश (सकल — साकार रूपके प्रतीक विग्रह) की पूजा करेगा, वह पुण्य जगत की सुष्टि और पालन आदि कार्य भी कर सकता है।
श्री शिवरात्रि को दिन-रात निराहार एवं जितेन्द्रिय रहकर अपनी शक्ति के अनुसार निष्कलभाव से मेरी यथोचित पूजा करेगा, उसको मिलने वाले फल का वर्णन सुनो।
एक वर्ष तक निरंतर मेरी पूजा करने पर जो फल मिलता है, वह सारा फल केवल शिवरात्रि को मेरी पूजा करने से मनुष्य तत्काल प्राप्त कर लेता है।
जैसे पूर्ण चंद्रमा का उदय संपूर्ण वृद्धि का अवसर है, उसी प्रकार यह शिवरात्रि तिथि मेरे धर्म की वृद्धि का समय है। इस तिथि में मेरी स्थापना आदि का मूल्यमय उत्सव होना चाहिए।
पहले मैं जब ‘ज्योतिर्मय’ सम्पूर्ण से प्रकट हुआ था, वह समय मार्गशीर्ष मास में आता था। उस समय मार्गशीर्ष मास में आता नक्षत्र होने पर पार्वती सहित मेरा दर्शन करता है। अथवा मेरी मूर्ति या लिङ्ग की ही झाँकी करता है, वह मेरे लिए कार्तिकेय से भी अधिक प्रिय है।
उस शुभ दिन को मेरे दर्शन मात्र से पूरा फल प्राप्त होता है। यदि दर्शन के साथ-साथ मेरी पूजा भी किया जाए तो इतना अधिक फल प्राप्त होता है कि उसका वर्णन नहीं हो सकता।
वहाँ पर मैं लिंग रूप से प्रकट होकर बहुत बड़ा हो गया था। अतः उस लिङ्ग के कारण यह भूल ‘लिङ्गस्थान’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
जगत के लोग इसका दर्शन और पूजा कर सकें, इसके लिए यह अनन्द और अनन्त ज्योति-स्तम्भ अथवा ज्योतिर्मय लिङ्ग अत्यंत छोटा हो जायगा।
यह लिङ्ग सब प्रकार के भोग सुलभ कराने वाला तथा भोग और मोक्ष का एकमात्र साधन है। इसका दर्शन, स्पर्श और ध्यान किया जाए तो यह प्राणियों को जन्म और मृत्यु के कष्ट से छुड़ाने वाला है।
अग्नि के पहाड़-जैसा जो यह शिवलिंग यहाँ प्रकट हुआ है, इसके कारण यह स्थान ‘अरुणाचल’ नाम से प्रसिद्ध होगा। यहाँ अनेक प्रकार के बड़े-बड़े तीर्थ प्रकट होंगे। इस स्थान में निवास करने या मरने से जीवों का मोक्ष हो जाएगा।
FAQs –
शिवरात्रि क्यों मनाई जाती है।
वैसे तो इसके कई कारण जो अन्य अन्य पुराणों में बताये गए है, लेकिन शिवरात्रि मनाने का एक कारण श्री शिवमहापुराण के माहात्म्य में बताया गया है, और उसी दिन से अरुणाचल क्षेत्र का भी विशेष माहात्म्य पता चलता है।
शिवरात्रि सबसे पहले अग्नि के पहाड़ के रूप शिवलिंग प्रकट हुए थे, जिस स्थान पर प्रकट उसका नाम अरुणाचल क्षेत्र पड़ा जो आज अरुणाचल प्रदेश है। शिवलिंग की सर्वप्रथम पूजा ब्रह्मा और विष्णु ने की थी। इसलिए उस मुहूर्त को शिवरात्रि के नाम से जानते है।
