गोवर्धन (अन्नकूट) पर्वत की परिक्रमा का माहात्म्य

स्रोत – संक्षिप्त श्रीवराहपुराण, अध्याय 164 165 पेज 292 – भगवान् वराह कहते हैं – देवि ! मथुरा के पास ही पश्चिम दिशा में दो योजन के विस्तार में गोवर्धन नाम से प्रसिद्ध एक क्षेत्र है, जहाँ वृक्षों और लताओं से मण्डित एक सुन्दर सरोवर भी है। मथुरा के पूर्व भाग में ‘इन्द्र’ तीर्थ, दक्षिण में ‘यम’ तीर्थ, पश्चिम में ‘वरुण’ तीर्थ और उत्तर में ‘कुबेर’ तीर्थ – ये चार तीर्थ हैं।

भद्रे ! यहाँ ‘अन्नकुण्ड’ नाम का भी एक क्षेत्र है, Govardhan Parvat ki Parikrama करने वाले मानव का संसार में फिर जन्म नहीं होता। फिर ‘मानसी-गङ्गा’ में स्नान कर गोवर्धन गिरि पर भगवान् श्रीकृष्ण का दर्शन करना चाहिये। जो इस गोवर्धन पर्वत की प्रदक्षिणा कर लेता है, उसके लिये कोई कर्तव्य शेष नहीं रह जाता।

सोमवती अमावास्या के दिन जो यहाँ जाकर पितरों को पिण्ड प्रदान करता है, उसे राजसूय यज्ञ का फल प्राप्त हो जाता है। गया तीर्थ में जाकर पिण्डदान करने वाले मनुष्यों को जो फल मिलता है, वही गोवर्धन पर पिण्डदान से सुलभ हो जाता है, इसमे विचार करने की आवश्यकता नहीं।

गोवर्धन भगवान् की परिक्रमा करने से राजसूय और अश्वमेध-यज्ञों का फल प्राप्त होता है। गोवर्धन की परिक्रमा की विधि यह है कि भाद्रपद मास के शुक्लपक्ष की पुण्यमयी एकादशी तिथि के दिन इस पर्वतके पास उपवास रहकर प्रातःकाल सूर्योदय के समय स्नानकर पर्वत पर स्थित श्रीहरिकी पूजा करनी चाहिये। इसके बाद ‘पुण्डरीक’ तीर्थ पर जाकर वहाँ के कुण्ड में स्नान कर देवताओं और पितरों को सम्यक् प्रकार से अर्चन करके भगवान् पुण्डरीक का पूजन करे।

वहाँ निर्मल जल से पूर्ण एक ‘अप्सरा-कुण्ड’ है। वहाँ स्नान करने से सभी पाप धुल जाते हैं। उस कुण्ड पर तर्पण करने से राजसूय और अश्वमेध यज्ञों का फल निश्चय ही मिल जाता है।

मथुरा में ‘संकर्षण’ नाम से विख्यात एक तीर्थ है, उसके रक्षक बलभद्र जी हैं। वहाँ जाने एवं स्नान करने से पहले से लगी हुई गोहत्या के पाप से मुक्ति हो जाती है।

पृथ्वि ! गोवर्धन के पास में ही एक ‘शक्रतीर्थ’ हैं। यहाँ श्रीकृष्ण ने इन्द्र की पूजा के लिये किये जा रहे यज्ञ को नष्ट कर दिया था। उस यज्ञ के अवसर पर भोज्य आदि पदार्थों की बहुत बड़ी ऊँची ढेरी लग गयी थी। उस समय इन्द्र के साथ श्रीकृष्ण का विवाद छिड़ गया। इन्द्र ने घोर वृष्टि की। वह जल व्रजवासियों तथा गौओं के लिये कष्टप्रद होने लगा। श्रीकृष्ण ने उनकी रक्षा करने के निमित्त इस श्रेष्ठ पर्वत (गोवर्धन) को हाथ पर उठा लिया था। तभी से यह पर्वत ‘अन्नकूट-पर्वत’ के नाम से विख्यात हो गया।

यहीं आगे एक स्वच्छ जल वाला ‘कदम्बखण्ड’ नामक कुण्ड है। वहाँ स्नान करके पितरों का तर्पण करने से ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। इसके बाद सौ शिखर वाले देवगिरि पर जाय, जहाँ स्नान एवं दर्शन करने से ‘वाजपेय’ यज्ञका फल मिलता है।

देवि ! जब ‘मानसीगङ्गा’ के उत्तर तट पर चक्र धारण करने वाले देवेश्वर श्रीहरि का अरिष्टासुर के साथ घोर युद्ध हुआ था, तब उस असुर ने अपना वेष बैल का बना लिया था। उसकी जीवन लीला श्रीकृष्ण के ही हाथ समाप्त हुई। उसके क्रोध पूर्वक एड़ी के प्रहार से पृथ्वी पर एक तीर्थ बन गया। यह वृषभासुर के वध से निर्मित तीर्थ अत्यन्त अद्भुत है-यह जानने योग्य बात है। उस वृषभ रूपी महासुर को मारने के पश्चात् श्रीकृष्ण ने उसी तीर्थ में स्नान किया था। यह जानकर श्रीकृष्ण के मन में चिन्ता उत्पन्न हो गयी कि यह पापी अरिष्टासुर बैल के रूप में था और मेरे हाथ इसकी हत्या हो गयी है। इतने ही में भगवती श्रीराधादेवी श्रीकृष्ण के समीप पधारीं। उन्होंने अपने नाम से सम्बद्ध उस स्थान को एक तीर्थ रूप कुण्ड बना दिया। तब से समस्त पापों को हरने वाले उस शुभ स्थान की ‘राधाकुण्ड’ नाम से प्रसिद्धि हुई। प्रसङ्गतया लोग उसे ‘अरिष्टकुण्ड’ और ‘राधाकुण्ड’ भी कहते हैं। वहाँ स्नान करने से राजसूय और अश्वमेध-यज्ञों का फल मिलता है।

मथुरा के पूर्व दिशा में एक तीर्थ ‘इन्द्रध्वज’ के नाम से विख्यात है, वहाँ स्नान करने वाले स्वर्गलोक में जाते हैं। यहाँ परिक्रमा एवं यात्रा का पुण्य भगवान्‌ को समर्पित कर देना चाहिये। मनुष्य का कर्तव्य है कि प्रारम्भ करते समय ‘चक्रतीर्थ’ में स्नान करे और यात्रा समाप्ति के अवसर पर ‘पञ्चतीर्थकुण्ड’ में स्नान कर ले। यहाँ रात्रि जागरण का भी नियम है। इससे मनुष्य के सभी पाप नष्ट हो जाते हैं।

भद्रे ! ‘अन्नकूटपर्वत’ की परिक्रमा का विधान मैंने तुमसे बतला दिया। इसी प्रकार इसी क्रम से आषाढ़में भी प्रदक्षिणा की जाती है। जो मनुष्य भक्ति पूर्वक भगवान् श्रीहरि के इस तीर्थ की प्रदक्षिणा के प्रसङ्गका तथा गोवर्धन के माहात्म्य को सुनता है, उसे गङ्गा में स्नान करने का फल मिल जाता है।

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भगवान् वराह कहते हैं – पृथ्वि ! अब एक इतिहास युक्त दूसरा प्रसङ्ग सुनो। –

मथुरा के दक्षिण किसी नगर में सुशील नामक एक धनी वैश्य रहता था। उस वैश्य का प्रायः सारा जीवन क्रय-विक्रय में ही बीत गया। न कभी उसे किसी प्रकार का सत्सङ्ग प्राप्त हुआ और न उसने कोई दान-धर्म आदि सत्कर्म ही किये। इस प्रकार गृह-कुटुम्ब में आसक्त रहते ही वह वैश्य इस लोक से चल बसा और उसे प्रेतयोनि मिली और बिना जल वाले तथा छाया रहित जङ्गलों में भूख-प्यास से व्याकुल होकर वह इधर-उधर भटकने लगा। यों घूमता हुआ वह भयंकर प्रेत मरुस्थल में पहुँच गया और बहुत दिनों तक वहाँ एक वृक्ष पर निवास करता रहा।

पृथ्वि ! इस प्रकार बहुत समय व्यतीत हो जाने पर दैवयोग से वहाँ एक खरीद-बिक्री करने वाला वैश्य आया, जिसे देखकर उस प्रेत को अत्यन्त प्रसन्नता हुई और नाचते हुए वह बोला- ‘अहो ! तुम इस समय मेरा आहार बनकर यहाँ आ गये हो।’ अब क्या था, प्रेत की बात सुनकर वह व्यापारी वैश्य अत्यन्त भयभीत होकर भाग चला। पर प्रेत ने दौड़कर उसे पकड़ लिया और कहा- ‘अब मैं तुम्हें खाऊँगा।’

गोवर्धन की परिक्रमा करने से क्या फल प्राप्त होता है? गोवर्धन पर्वत की छोटी परिक्रमा कितने किलोमीटर की है? loading="lazy"

उस प्रेत की बात सुनकर महाजन ने कहा – ‘राक्षस! मैं अपने परिवार के भरण-पोषण के विचार से इस घोर वन में आया हूँ। मेरे घर में बूढ़े पिता और माता हैं, एक पतिव्रता पत्नी भी है। यदि तुम मुझे खा लोगे तो उन सब की मृत्यु हो जायगी।’ उस वैश्य की बात सुनकर प्रेत ने पूछा- ‘महामते ! तुम किस स्थान से यहाँ कैसे आये हो ? सब सत्य-सत्य बताओ।’

वैश्य ने कहा – ‘प्रेत! मैं गिरिराज गोवर्धन और महानदी यमुना- इन दोनों के बीच मथुरापुरी में रहता हूँ। मैंने पहले से जो कुछ सम्पत्ति संचित की थी, वह सब चोर उठा ले गये और मैं सर्वथा निर्धन हो गया, अतः थोड़ा धन लेकर व्यापार के लिये इस मरुस्थल की ओर आया हूँ। ऐसी स्थिति में अब तुम्हें जो जँचे, वह करो।

प्रेत ने कहा – ‘वैश्य ! तुम पर मुझे दया आ गयी है, अतः अब मैं तुम्हें खाना नहीं चाहता। यदि तुम मेरे वचन का पालन कर सको तो एक शर्त पर मैं तुम्हें छोड़ दूंगा। तुम मेरा एक कार्य सिद्ध करने के लिये यहाँ से लौटकर मथुरा जाओ।

वहाँ जाकर तुम ‘चातुः सामुद्रिक’ नामक कूप पर जाकर सविधि स्नान कर मेरे नाम का उच्चारण करके अपने घर के धन से विधि पूर्वक पिण्ड दान करो और उन स्नान-दानादि सभी कर्मों का फल मुझे दे देना। बस, इतना ही काम है, अब तुम सुख-पूर्वक जा सकते हो।’

प्रेत की बात सुनकर वैश्यने उत्तर दिया- ‘प्रेत! मेरे पास एक मकान को छोड़कर घर पर और कोई धन नहीं है।’ इस पर प्रेत ने उससे मुस्कराकर कहा- ‘वैश्य ! मैंने जो तुमसे कहा है कि तुम्हारे घर में धन है, उसका अभिप्राय यह है- तुम्हारे घर में एक गड्डा है और उसमें सुवर्ण की बहुत बड़ी संचित राशि गड़ी है। मैं तुम्हें मथुरा का मार्ग भी दिखला देता हूँ।’

सूत जी कहते हैं – ऋषियो ! इस पर उस वैश्य ने पुनः पूछा – ‘प्रेत! इस योनि में तुम्हें ऐसा दिव्य ज्ञान कैसे प्राप्त है?

प्रेत ने कहा – ‘वैश्य ! मैं भी पहले जन्म में मथुरा का निवासी था। जहाँ साक्षात् भगवान् श्रीकृष्ण विराजते हैं। एक दिन प्रातःकाल उन भगवान्‌ के मन्दिर पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रजनों का समाज जुटा था। वहाँ एक श्रेष्ठ कथावाचक बैठे थे जो पुराणों की पवित्र कथा कह रहे थे।

मेरा एक मित्र भी प्रतिदिन वहीं जाया करता था। उस दिन मित्र की प्रेरणा से मैं भी वहाँ पहुँच गया। अत्यन्त आदर के साथ समाज ने बार-बार मुझे संतुष्ट करने का प्रयत्न किया। उसमें मैंने सुना कि वहाँ एक पवित्र कूप है जो पापों को धो डालता है। इस कूप में चारों समुद्र आ करके प्रतिष्ठित होते हैं। इस कूप के माहात्म्य को सुनने से महान् फल मिलता है।

उस समय सभी श्रेष्ठ पुरुषों ने कथा-वाचक जी को धन दिया, किंतु मैं मौन रह गया। तब मित्र ने मुझसे पुनः कहा-‘प्रियवर! अपनी शक्ति के अनुसार कुछ अवश्य देना चाहिये।’ इस पर मैंने उन कथावाचक को एक ‘सुवर्ण’ (आठ रत्ती सोने की एक मुद्रा) प्रदान कर दिया। इसके बाद जब मेरी मृत्यु हुई तो मेरे पूर्वकर्मों के अनुसार यमराज की आज्ञा से मुझे यह दुःखद प्रेतयोनि मिली। मैंने पूर्वजन्म में कभी तीर्थ स्नान, दान-हवन अथवा पितरों के लिये तर्पण नहीं किये थे, इसी कारण मुझे प्रेत बनना पड़ा।’

What is the mystery of Govardhan Parvat loading="lazy"

इस पर उस वैश्य ने पुनः पूछा- ‘तुम इस वृक्ष की जड़ में रहकर कैसे प्राण धारण करते हो?’

प्रेत बोला – ‘पहले की बातें मैं तुम्हें बता ही चुका हूँ। मैंने उन कथावाचक को जो सुवर्ण मुद्रा दी थी, उसीके प्रभाव से मैं इस वृक्ष पर भी प्रायः तृप्त रहता हूँ, यद्यपि उसे भी मैंने दूसरे की प्रेरणासे ही दी थी। इसी का परिणाम है कि प्रेतयोनि में भी मेरा दिव्य ज्ञान बना है।

वसुंधरे ! प्रेत की बात सुनकर वह वैश्य मथुरा पुरी गया और वहाँ पहुँचकर उसने प्रेत के निर्देशानुसार सब कुछ वैसा ही किया। इससे वह प्रेत मुक्त होकर स्वर्ग गया।

देवि! यह मथुरापुरी का माहात्म्य है। यहाँ ‘चतुःसामुद्रिक’ कूप पर पिण्डदान करने से परम गति प्राप्त होती है।

Where is real Govardhan Parvat?
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मथुरा के किसी स्थान पर, चाहे वह देवालय हो या चौराहा-जहाँ-कहीं भी किसी की मृत्यु हो, वह मुक्त हो जाता है, इसमें संदेह नहीं। दूसरी जगह के किये हुए पाप तीर्थों में जाने पर नष्ट हो जाते हैं, पर जो पाप उन तीर्थस्थानों में किये जाते हैं, वे तो वज्रलेप हो जाते हैं। पर यह मथुरापुरी की ही विशेषता है कि यदि (भूलसे) यहाँ पाप बन भी गया तो वह वहीं नष्ट भी हो जाता है, क्योंकि यह पुरी परम पुण्यमयी है और इसमें कहीं पाप के लिये स्थान नहीं है।

यदि कोई एक पुरुष हजार युगों तक एक पैर पर खड़ा होकर तपस्या करे और एक व्यक्ति मथुरा में निवास करे तो मथुरावासी का पुण्य ही अधिक होता है। मथुरा में जो क्रोध रहित मानव देवताओं की पूजा तथा तीर्थों में स्नान करते हैं, वे देवयोनि में जाते हैं। दूसरी जगह एक हजार महाभाग ब्राह्मणों की पूजा करने से जो फल मिलता है, वही
फल मथुरा में एक ब्राह्मण की पूजा से प्राप्त होता है; क्योंकि देवताओं का सिद्ध समाज मथुरा में आकर सामान्य प्राणी के रूप में स्थित है। देवताओं, सिद्धों और भूतों का जो समुदाय है, वे सभी यहाँ चार भुजा वाले विष्णु स्वरूप मथुरावासी प्राणियों का दर्शन करने आते हैं; अतः मथुरा में जो मनुष्य हैं, वे विष्णुके ही स्वरूप हैं।


गोवर्धन (अन्नकूट) पर्वत की परिक्रमा का माहात्म्य [अध्याय १६४-६५]
स्रोत – संक्षिप्त श्रीवराहपुराण, अध्याय 164 165 पेज 292

दंडवत आभार – श्रीगीताप्रेस, हरिद्वार द्वारा प्रकाशित पुस्तक के माध्यम से


 

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