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Sunday, 07 June 2026 | New Delhi

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मनुष्यों के विविध स्मृति धर्म तथा संस्कार क्या है?

क्या है सनातन धर्म में मनुष्यों के विभिन्न धर्म (स्मृति धर्म) और रीति-रिवाज, जिन्हे करने मात्र से मोक्ष और मुक्ति संभव है। जानिए विविध स्मृति धर्मों तथा संस्कारों का वर्णन –

मनुष्यों के विविध स्मृति धर्म तथा संस्कार क्या है?
जाने मनुष्य के धर्म और कर्तव्य जिसे हर मनुष्य को करना अनिवार्य है। Discover the duties and obligations of human beings—those that are mandatory for every individual to fulfill.

राजा शतानीक ने कहा – ब्रह्मन्‌ ! पाँच प्रकार के जो स्मृति आदि धर्म हैं, उन्हें जानने की मुझे बड़ी ही अभिलाषा है। कृपा पूर्वक आप उनका वर्णन करें।

सुमन्तुजी बोले – महाराज ! भगवान्‌ भास्कर ने अपने सारथि अरुण से जिन पाँच प्रकार के धर्मो को बतलाया था, मैं उनका वर्णन कर रहा हूँ, आप उन्हें सुनें।

भगवान्‌ सूर्य ने कहा – गरुडाग्रज ! स्मृतिप्रोक्त धर्म का मूल सनातन वेद ही है। पूर्वानुभूत ज्ञान का स्मरण करना ही स्मृति है। स्मृत्यादि धर्म पाँच प्रकार के होते हैं। इन धर्मो का पालन करने से स्वर्ग और मोक्ष की प्राप्ति होती है तथा इस लोक में सुख,
यश और ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

  1. पहला वेद, धर्म है।
  2. दूसरा है आश्रम-धर्म अर्थात्‌ ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास ।
  3. तीसरा है वर्णाश्रम धर्म अर्थात्‌ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ।
  4. चौथा है गुण धर्म
  5. और पाँचवाँ है नैमित्तिक धर्म

ये ही स्मृत्यादि पाँच प्रकार के धर्म कहे गये हैं। वर्ण और आश्रम धर्म के अनुसार अपने कर्तव्यों का निर्वाह करते हुए कर्मों को सम्पादित करना ही वर्णाश्रम और आश्रम धर्म कहलाता है। जिस धर्म का प्रवर्तन गुण के द्वारा होता है, वह गुण धर्म कहलाता है।

किसी निमित्त को लेकर जो धर्म प्रवर्तित होता है, उसे नैमित्तिक धर्म कहते हैं। यह नैमित्तिक धर्म जाति, द्रव्य तथा गुण के आधार पर होता है। निषेध और विधिरूप में शास्त्र दो प्रकार के होते हैं।

स्मृतियाँ पाँच प्रकार की हैं।

  1. दृष्ट-स्मृति
  2. अदृष्ट-स्मृति
  3. दृष्टादृष्ट-स्मृति
  4. अनुवाद-स्मृति और
  5. अदृष्टादृष्ट-स्मृति।

सभी स्मृतियों का मूल वेद ही है।

स्मृतिधर्म के साधन-स्थान ब्रह्मावर्त, मध्यक्षेत्र, मध्यदेश, आर्यावर्त तथा यज्ञिय आदि देश हैं।

  • सरस्वती और दृषद्वती (कुरुक्षेत्रके दक्षिण सीमा की एक नदी) इन दो देव-नदियों के बीच का जो देश है वह देव-निर्मित देश ब्रह्मावर्त नाम से कहा जाता है।
  • हिमाचल और विन्ध्यपर्वत के बीच के देश को जो कुरुक्षेत्र के पूर्व और प्रयाग के पश्चिम में स्थित है, उसे मध्यदेश कहा जाता है ।
  • पूर्व-समुद्र तथा पश्चिम-समुद्र, हिमालय तथा विन्ध्याचल पर्वत के बीच के देश को आर्यावर्तदेश कहा जाता है।
  • जहाँ कृष्णसार मृग (कस्तूरी मृग) विचरण करते हैं और स्वभावत: निवास करते हैं, वह यज्ञियदेश है।
  • इनके अतिरिक्त दूसरे अन्य देश म्लेच्छदेश हैं जो यज्ञ आदि के योग्य नहीं हैं। ट्विजातियों को चाहिये कि विचारपूर्वक इन देशों में निवास करें।

भगवान्‌ आदित्य ने पुनः कहा – खगराज! अब मैं आश्रम धर्म बतला रहा हूँ।

  1. ब्रह्मचर्याश्रम- धर्म
  2. गृहस्थाश्रम-धर्म
  3. वानप्रस्थाश्रम-धर्म
  4. और संन्यासाश्रम-धर्म

क्रम से इन चार प्रकार से जीवन-यापन करने को आश्रमधर्म कहा जाता है।

एक ही धर्म चार प्रकार से विभक्त हो जाता है ब्रह्मचारी को गायत्री की उपासना करनी चाहिये। गृहस्थ को संतानोत्पत्ति और ब्राह्मण, देव आदि की पूजा करनी चाहिये। वानप्रस्थी को देवव्रत-धर्म का और संन्यासी को नैष्ठिक धर्म का पालन करना चाहिए। इन चारों आश्रमों के धर्म वेदमूलक हैं।

संस्कार –

  • गृहस्थ को ऋतुकाल में मन्त्रपूर्वक गर्भाधान-संस्कार करना चाहिये।
  • तीसरे मास में पुंसवन तथा छठे अथवा सातवें मास में सीमन्तोन्नयन-संस्कार करना चाहिए।
  • जन्म के समय जातकर्म-संस्कार करना चाहिए। जातक (शिशु) को स्वर्ण, घी, मधु का मन्त्रों द्वारा प्राशन कराना चाहिये।
  • जन्मसे दसवें, ग्यारहवें या बारहवें दिन शुभ मुहूर्त, तिथि, नक्षत्र, योग आदि देखकर नामकरण-संस्कार करना चाहिये।
  • शास्त्रानुसार छठे मास में अन्नप्राशन करना चाहिये। सभी द्विजाति बालकों का चूडाकरण-संस्कार एक वर्ष अथवा तीसरे वर्ष में करना चाहिये।
  • ब्राह्मण-बालक का आठवें वर्ष में, क्षत्रिय का ग्यारहवें और वैश्य का बारहवें वर्ष में यज्ञोपवीत-संस्कार करना उत्तम होता है। गुरुसे गायत्रीकी दीक्षा ग्रहण कर वेदाध्ययन करना चाहिये।
  • विद्याध्ययन के पश्चात्‌ गुरु की आज्ञा प्राप्त कर गृहस्थाश्रम में प्रवेश करना चाहिये और गुरु को यथेष्ट सुवर्णादि देकर प्रसन्न
    करना चाहिये। गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर अपने समान वर्ण वाली उत्तम गुणों से युक्त कन्या से विवाह करना चाहिये। जो कन्या माता-पिता के कुल से सात पीढ़ी तक की न हो और समान गोत्र की न हो ऐसी अपने वर्ण की कन्या से विवाह करना चाहिये।

विवाह आठ प्रकारके होते हैं –

  1. ब्राह्म
  2. दैव
  3. आर्ष
  4. प्राजापत्य
  5. आसुर
  6. गान्धर्व
  7. राक्षस
  8. और पैशाच।

वर और कन्या के गुण-दोष को भलीभाँति परखने के बाद ही विवाह करना चाहिये। कन्याएँ अवस्था-भेद से चार प्रकार की होती हैं। जिनके नाम इस प्रकार हैं -गौरी, नग्निका, देवकन्या तथा रोहिणी। सात वर्ष की कन्या गौरी, दस वर्ष की नग्निका, बारह वर्ष की देवकन्या तथा इससे अधिक आयु की कन्या रोहिणी (रजस्वला) कहलाती है।

निन्दित कन्याओं से विवाह नहीं करना चाहिये | द्विजातियों को अग्नि के साक्ष्य में विवाह करना चाहिये। स्त्री-पुरुष के परस्पर मधुर एवं दृढ़ सम्बन्धों से धर्म, अर्थ और काम की उत्पत्ति होती है और वही मोक्ष का कारण भी है।


स्रोत – संक्षिप्त श्रीभविष्यपुराण – ब्राह्मपर्व – (अध्याय १८१-१८२)
दंडवत आभार – श्री गीताप्रेस गोरखपुर द्वारा मुद्रित संक्षिप्त भविष्यपुराण, पेज संख्या – 207-208

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