- रघुकुल के श्रेष्ठ वीर ककुत्स्थ कुलभूषण श्रीराम और लक्ष्मण को राक्षस लिये जा रहा है- यह देखकर सीता अपनी दोनों बाँहें ऊपर उठाकर जोर-जोर से रोने-चिल्लाने लगीं।
‘हाय! इन सत्यवादी, शीलवान् और शुद्ध आचार विचार वाले दशरथ नन्दन श्रीराम और लक्ष्मण को यह रौद्र रूप धारी राक्षस लिये जा रहा है।
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‘राक्षसशिरोमणे ! तुम्हें नमस्कार है। इस वन में रीछ, व्याघ्र और चीते मुझे खा जायँगे, इसलिये तुम मुझे ही ले चलो, किंतु इन दोनों ककुत्स्थ वंशी वीरों को छोड़ दो’
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विदेह नन्दिनी सीता की यह बात सुनकर वे दोनों वीर श्रीराम और लक्ष्मण उस दुरात्मा राक्षस का वध करने में शीघ्रता करने लगे। सुमित्रा कुमार लक्ष्मण ने उस राक्षस की बायीं और श्रीराम ने उसकी दाहिनी बाँह बड़े वेग से तोड़ डाली। भुजाओं के टूट जाने पर वह मेघ के समान काला राक्षस व्याकुल हो गया और शीघ्र ही मूर्च्छित होकर वज्र के द्वारा टूटे हुए पर्वत शिखर की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़ा। तब श्रीराम और लक्ष्मण विराध को भुजाओं, मुक्कों और लातों से मारने लगे तथा उसे उठा-उठाकर पटकने और
पृथ्वी पर रगड़ने लगे। बहुसंख्यक बाणों से घायल और तलवारों से क्षत विक्षत होने पर तथा पृथ्वी पर बार-बार रगड़ा जाने पर भी वह राक्षस मरा नहीं।अवध्य तथा पर्वत के समान अचल विराध को बारबार देखकर भय के अवसरों पर अभय देने वाले श्रीमान् राम ने लक्ष्मण से यह बात कही।
‘पुरुषसिंह ! यह राक्षस तपस्यासे (वर पाकर) अवध्य हो गया है। इसे शस्त्र के द्वारा युद्ध में नहीं जीता जा सकता। इसलिये हमलोग निशाचर विराध को पराजित करने के लिये अब गड्डा खोदकर गाड़ दें।
‘लक्ष्मण! हाथीके समान भयंकर तथा रौद्र तेज वाले इस राक्षस के लिये इस वन में बहुत बड़ा गड्डा खोदो’
इस प्रकार लक्ष्मणको गड्डा खोदनेकी आज्ञा देकर पराक्रमी श्रीराम अपने एक पैरसे विराध का गला दबाकर खड़े हो गये। श्रीरामचन्द्र जी की कही हुई यह बात सुनकर राक्षस विराध ने पुरुष प्रवर श्रीराम से यह विनय युक्त बात कही –
‘पुरुषसिंह ! नरश्रेष्ठ ! आपका बल देवराज इन्द्र के समान है। मैं आपके हाथ से मारा गया। मोह वश पहले मैं आपको पहचान न सका। ‘तात! आपके द्वारा माता कौसल्या उत्तम संतान वाली हुई हैं। मैं यह जान गया कि आप ही श्रीरामचन्द्रजी हैं। यह महाभागा विदेह नन्दिनी सीता हैं और ये आपके छोटे भाई महा यशस्वी लक्ष्मण हैं।
मुझे शाप के कारण इस भयंकर राक्षस शरीर में आना पड़ा था।
- मैं तुम्बुरु नामक गन्धर्व हूँ। कुबेर ने मुझे राक्षस होने का शाप दिया था। जब मैंने उन्हें प्रसन्न करने की चेष्टा की, तब वे महायशस्वी कुबेर मुझसे इस प्रकार बोले- ‘गन्धर्व! जब दशरथ नन्दन श्रीराम युद्ध में तुम्हारा वध करेंगे, तब तुम अपने पहले स्वरूप को प्राप्त होकर स्वर्गलोक को जाओगे।
‘मैं रम्भा नामक अप्सरा में आसक्त था, इसलिये एक दिन ठीक समय से उनकी सेवा में उपस्थित हो न सका। इसीलिये कुपित हो राजा वैश्रवण (कुबेर) ने मुझे पूर्वोक्त शाप देकर उससे छूटने की अवधि बतायी थी।
शत्रुओं को संताप देने वाले रघुवीर ! आज आपकी कृपा से मुझे उस भयंकर शाप से छुटकारा मिल गया। आपका कल्याण हो, अब मैं अपने लोक को जाऊँगा।
तात! यहाँ से डेढ़ योजन की दूरी पर सूर्य के समान तेजस्वी प्रतापी और धर्मात्मा महामुनि शरभङ्ग निवास करते हैं। उनके पास आप शीघ्र चले जाइये, वे आपके कल्याण की बात बतायेंगे।
श्रीराम ! आप मेरे शरीर को गड्ढे में गाड़कर कुशल पूर्वक चले जाइये। मरे हुए राक्षसों के शरीर को गड्ढे में गाड़ना (कब्र खोदकर उसमें दफना देना) यह उनके लिये सनातन (परम्पराप्राप्त) धर्म है। जो राक्षस गड्ढे में गाड़ दिये जाते हैं, उन्हें सनातन लोकों की प्राप्ति होती है।
श्रीराम से ऐसा कहकर बाणों से पीड़ित हुआ महाबली विराध (जब उसका शरीर गड्ढे में डाला गया, तब) उस शरीर को छोड़कर स्वर्गलोक को चला गया।
(वह किस तरह गड्ढेमें डाला गया? यह बात अब बतायी जाती है)
उसकी बात सुनकर श्रीरघुनाथजी ने लक्ष्मण को आज्ञा दी ‘लक्ष्मण ! भयंकर कर्म करने वाले तथा हाथी के समान भयानक इस राक्षस के लिये इस वन में बहुत बड़ा गड्ढा खोदो’ . - इस प्रकार लक्ष्मण को गड्डा खोदने का आदेश दे पराक्रमी श्रीराम एक पैर से विराध का गला दबाकर खड़े हो गये। तब लक्ष्मण ने फावड़ा लेकर उस विशालकाय विराध के पास ही एक बहुत बड़ा गड्डा खोदकर तैयार किया। तब श्रीराम ने उसके गले को छोड़ दिया और लक्ष्मण ने खूँटे-जैसे कान वाले उस विराध को उठाकर उस गड्ढे में डाल
दिया, उस समय वह बड़ी भयानक आवाज में जोर-जोर से गर्जना कर रहा था।युद्ध में स्थिर रहकर शीघ्रता पूर्वक पराक्रम प्रकट करने वाले उन दोनों भाई श्रीराम और लक्ष्मणने रणभूमि में क्रूरतापूर्ण कर्म करने वाले उस भयंकर राक्षस विराध को बलपूर्वक उठाकर गड्ढे में फेंक दिया। उस समय वह जोर-जोर से चिल्ला रहा था। उसे गड्डे में डालकर वे दोनों बन्धु बड़े प्रसन्न हुए। महान् असुर विराध का तीखे शस्त्र से वध होने वाला नहीं है, यह देखकर अत्यन्त कुशल दोनों भाई नरश्रेष्ठ श्रीराम और लक्ष्मण ने उस समय गड्डा खोदकर उस गड्डेमें उसे डाल दिया और उसे मिट्टी से पाटकर उस राक्षस का वध कर डाला।
वास्तव में श्रीराम के हाथ से ही हठपूर्वक मरना उसे अभीष्ट था। उस अपनी मनोवाञ्छित मृत्यु की प्राप्ति के उद्देश्य से स्वयं वनचारी विराध ने ही श्रीराम को यह बता दिया था कि शस्त्र द्वारा मेरा वध नहीं हो सकता। उसकी कही हुई उसी बात को सुनकर श्रीराम ने उसे गड्डे में गाड़ देने का विचार किया था।
जब वह गड्ढे में डाला जाने लगा, उस समय उस अत्यन्त बलवान् राक्षस ने अपनी चिल्लाहट से सारे वनप्रान्त को गुँजा दिया। राक्षस विराध को पृथ्वी के अंदर गड्ढे में गिराकर श्रीराम और लक्ष्मण ने बड़ी प्रसन्नता के साथ उसे ऊपर से बहुतेरे पत्थर डालकर पाट दिया। फिर वे निर्भय हो उस महान् वन में सानन्द विचरने लगे।
इस प्रकार उस राक्षस का वध करके मिथिलेश-कुमारी सीता को साथ ले सोने के विचित्र धनुषों से सुशोभित हो वे दोनों भाई आकाश में स्थित हुए चन्द्रमा और सूर्य की भाँति उस महान् वन में आनन्दमग्न हो विचरण करने लगे।
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स्रोत – श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्य के अरण्यकाण्ड में चौथा सर्ग –
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जो (कब्र) गड्ढे में गाड़ दिए जाते हैं, उन्हें सनातन लोक की प्राप्ति होती है?






