लंका से लौटते समय हनुमान जी का अहंकार कैसे टूटा?

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श्रीरामचन्द्रो विजयतेतराम्

श्री हनुमान जी जब सीता माता से मुद्रिका लेकर जब उनका बताने के लिए लंका से वापस लौटने लगे, तब लौटते समय उत्तर दिशा की ओर कुछ दूर आगे जाकर वे नीचे उतरे, तो वहाँ उन्होंने एक मुनि को विराजमान देखा ॥

तव कुछ गर्व से मारूति ने कहा- हें मुनीश्वर ! में श्रीराम का काज संपन्न करके आ रहा हूँ। यहाँ में पानी पीने की इच्छा से आया हूँ । मुझे कोई जलाशय वतलाइये ।
तब मुनि ने उन्हें अपनी अंगुली से इशारा करके जलाशय बतला दिया।

तदनन्तर हनुमान जी अंगूठी, चूडामणि तथा ब्रह्मा जी द्वारा दिया गया पत्र मुनि के पास रखकर उस उत्तम तालाब की ओर जल पीने गये, इतने में किसी बन्दर ने आकर श्रीराम की मुद्रिका कों मुनि के पास रखे कमण्डलु में डाल दिया। उधर से हनुमानजी भी आ पहुँचे।

चूड़ामणि तथा पत्र के देखने के बाद उन्होंने मुद्रिका के विषय में मुनि से पूछा कि मुद्रिका कहाँ गयी ?
मुनि ने भौंहों के संकेत से कमण्डलु दिखाया ॥

जब श्री हनुमान जी ने कमण्डलु में देखा तो उसमें श्रीराम की हजारों मुद्रिकाये दिखायी दीं। तब हनुमान जी ने आश्चर्य चकित होकर मुनि से पूछा कि इतनी अंगुठियां कहाँ से आयीं?

हे मुनिश्वेष्ट ! आप यह भी कहिये कि इनमें से मेरी मुद्रिका कौन-सी है ?

मुनि ने उत्तर दिया कि जब-जब श्रीराम की आज्ञा से किसी हनुमान ने लंका में जाकर सीता का पता लगाया है वे ही मुद्रिकाएं मेरे सामने रक्खी हैं, क्युकी तब-तब बन्दरों ने उन्हें इस कमण्डलु में डाल दी हैं। वे ही ये सब हैं। इनमें से तुम अपनी मुद्रिका खोज लो |

मुनि के इस वाक्य कों सुनकर हनुमान जी का गर्व खंड खंड हो गया।

तब उन्होंने मुनि से कहा– हे मुनिश्वर ! यहाँ कितने राम आये हैं?

मुनि ने कहा कि –कमण्डलु में से अंगूठियां निकाल कर गिन लो।

अब हनुमान जी कमण्डलु से अंजलि भर भर कर बारम्बार अंगूठियां बाहर निकालने लगे। पर अंगूठियां ख़त्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी। अतः उन्होंने वापस उन अंगूठियों को कमण्डलु में भर दिया और नमस्कार करके क्षण भर में विचार करने लगे कि ओह ! अर्थात पहले मेरे जैसे सैंकड़ों हनुमान जाकर सीता की खबर ले आये है, तो मेरी कौन सी गिनती है।

यह निश्चय करके वीर हनुमान घमंड को त्यागकर वहां के लिए चल दिए, जहाँ उपवासी दशा में बैठे हुए वे सब वानर श्री हनुमान जी को देखकर अति प्रसन्न हुए।

Source – श्रीमदआनंदरामायण, सर्ग ९, ll २८० से २९८ तक ll

श्रीरामकाज हेतु

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