सबसे पहले इंद्र ने ब्रह्म को कैसे देखा?

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पूर्वकाल में देवताओं और असुरो के साथ संग्राम हुआ, ब्रह्म ने अपनी आज्ञा में चलने वाले और जगत-स्थिति (लोक-मर्यादा) की रक्षा के लिए देवताओं का साथ दिया। उसने देवताओं के शत्रु तथा ईश्वर की मर्यादा भंग करने वाले असुरो को जीतकर जगत की स्थिति के लिए वह जय अर्थात जीत का फल देवताओ को दे दिया। उस ब्रह्म की इच्छा के कारण मात्र से देवता विजयी हुए। इस विजय में देवताओ ने गौरव को प्राप्त किया। और वे महिमा को प्राप्त हुए, अर्थात इसमें उन्होंने अपनी ही महिमा समझी क्युकी लोक की स्थिति के हेतुभूत यज्ञादि को नष्ट करने वाले असुरों के पराजित हो जाने पर देवताओं ने वृध्दि अर्थात खूब सत्कार प्राप्त किया।

तब, ‘अन्तःकरण मे स्थित, प्रत्यगात्मा, सर्वज्ञ, प्राणियों के सम्पूर्ण कर्मफलों का संयोग कराने वाले, सर्व-शक्तिमान्‌ एवं जगत्‌ की रक्षा करने के इच्छुक ईश्वर की ही यह सम्पूर्ण जय और महिमा है’ इस बात को न जानते हुए आत्मा को अग्नि आदि रूपो से परिच्छिन्न मानने वाले देवता सोचने लगे कि-

“हम लोगो की ही युद्द में विजय हुई है, और इस बिजय की फलभूत अग्नित्व (अग्नि तत्व), वायुत्व (वायु तत्व), एवं इन्द्रत्वरूप यह महिमा भी इमारी ही है; अतः हमारे द्वारा ही इसका अनुभव किया जाता है; यह बिजय अथवा महिमा हमारे अन्तरात्मभूत ईश्वर की नहीं हुई है। ”

अन्तःकरणो का प्रेरक होने के कारण वह ब्रह्म सबका साक्षी है। और वह देवताओ के इस मिथ्या ज्ञान को जानकर, कही इस मिथ्या ज्ञान से असुरों की ही भाँति देवताओ का भी परामव न हो जाए, इसलिए उन पर अनुकम्पा करते हुए यह सोचकर कि देवताओ के मिथ्याज्ञान कों निर्वृत करके, मैं उन्हें अनुग्रहित करूँ। अपनी योगमाया के प्रभाव से सबको बिस्मित करने वाले अति अद्भुत-रूप से देवताओ की इन्द्रियो का त्रिपय होकर प्रार्दुभूत अर्थात्‌ यक्ष के रूप में प्रकट हुआ |

उस प्रकट हुए ब्रह्म को देवता लोग यह न जान सके कि यह यक्ष अर्थात्‌ पूजनीय महान प्राणी कौन है?

उस यक्ष को न पहचाने वाले देवताओ ने भीतर से डरते-डरते उसे जानने की इच्छा से सबसे आगे चलने वाले इंद्र ने सर्वज्ञकल्प जातिवेदस अग्निदेव से कहा – ‘हे जातबेद: | हमारे नेत्रो के सम्मुख स्थित इस यक्ष कों जानो और विशेष रूप से मालूम करो कि यह यक्ष कौन है ? क्युकी तुम हम सबमे तेजस्वी हो।

तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर, अग्नि उस यक्ष के समीप गया, और चुपचाप खड़ा हो गया। तब प्रश्न करने की इच्छा जानकार उस यक्षरूप ब्रह्म ने पूछा कि तू कौन है?
ब्रह्म के इस प्रकार से पूछने पर, अग्नि ने कहा – “मैं अग्नि नाम से प्रसिद्द जातिवेदा हूँ।” इस प्रकार से अग्नि ने दो नामों से प्रसिद्द होने के कारण अपनी प्रशंसा करते हुए कहा।

यक्ष ने पूछा – तुझमे क्या सामर्थ्य है?

अग्नि ने कहा – इस पृथ्वी पर जो कुछ भी है, मैं उस सभी को जला सकता हूँ। जो भी वस्तु आकाश में रहती है उसे भी अग्नि जला सकती है।

इस प्रकार से अमिमान करने वाले उस अग्नि के लिये ब्रह्म ने एक तिनका अर्थात्‌ उसके आगे तृण (तिनका ) डाल दिया ।

और यक्ष ने कहा कि “तू मेरे सामने इस तिनके कों जला, यदि तू इसे जलाने मे समर्थ नहीं है तो सर्वत्र जलाने वाला होने का अभिमान छोड़ दे’

फिर अग्नि अपने सारे बल और उत्साह के साथ सम्पूर्ण वेग से उस तृण के पास गया। किन्तु वहाँ जाकर भी वह उसे जलाने मे समर्थ न हुआ |

इस प्रकार उस तिनके को जलाने मे असमर्थ वह अग्नि हतप्रतिज्ञ होने के कारण लज्जित होकर उस यक्ष के पास से चुपचाप देवताओ के पास लौट आया | और बोला – कि मैं इस यक्ष के बारे में कुछ भी नहीं जान पाया, कि वह यक्ष कौन है?

तदनन्तर, उन देवताओ ने वायु से कहा – हे वायो ! इस बात को मालूम करो कि यह यक्ष कौन है?

उसने कहा – बहुत अच्छा।

तब वायु उस यक्ष के पास गया, और खड़ा हो गया। तब यक्ष ने उससे भी पूछा – ‘तू कौन है?’

उसने कहा – ‘मैं वायु हूँ, और मैं निश्चय ही मातरिश्वा ही हूँ। (वायु को वान अर्थात गमन या गंध ग्रहण करने के कारण वायु कहा जाता है। ‘मातरि ‘ अंतरिक्ष में श्रयण (विचरण) करने के कारण इन्हे मातरिश्वा भी कहा जाता है। )

यक्ष ने पूछा – तुझमे क्या सामर्थ्य है?

वायु ने कहा – इस पृथ्वी पर जो कुछ भी है उसे में अपने आप में ग्रहण कर सकता हूँ

तब यक्ष ने वायु के सामने भी वही तिनका रखा और कहा इसे ग्रहण कर।

वायु उस तिनके के समीप बड़े वेग से गया लेकिन वह तिनके को हिला भी नहीं पाया। तब वह वापस इन्द्रादि देवताओं के पास लौट आया और बोला यह यक्ष कौन है इस बात को जानने में असमर्थ रहा हूँ। मैं यह नहीं जान सका कि यह कौन है।

फिर देवताओ ने इन्द्र से हे मघवन्‌ | इसे जानो!

इन्द्र अर्थात्‌ परमेश्वर, जो बलवान्‌ होनेके कारण “मघवा” कहा गया है, फिर बहुत अच्छा–ऐसा कहकर उसकी ओर बढ़ा । अपने समीप आये हुए उस इन्द्र के सामने से वह ब्रह्म अन्तर्धान हो गया | इन्द्र का सबसे बढ़ा हुआ इन्द्रत्व का अभिमान तोड़ना चाहिये, इसलिये इन्द्र को ब्रह्म ने संवादमात्र का भी अवसर नही दिया।
इन्द्र आदित्य अथवा वज्रधारी देवराज का नाम है; क्योकि दोनों ही अर्थो मे कोई विरोध नही है । ब्रह्म जो इन्द्र के समीप आते ही अन्तर्धान हो गया इसमे यह अभिप्राय था कि –

यक्ष ने देखा- इसे “मै इन्द्र ( देवराज ) हूँ? ऐसा सोचकर सबसे अधिक अमभिमान है। अतः उस पर कृपा करने के लिए वह यक्ष अंतर्ध्यान हो गया।

फिर अभिमान शान्त हो जाने पर, इन्द्र ब्रह्म का अत्यन्त जिज्ञासु होकर उसी आकाश मे, जिसमे कि ब्रह्म का आविर्भाव एवं तिरोभाव हुआ था,इधर उधर देखने लगा।
वहाँ उसने एक अत्यन्त रूपवती स्त्री को देखा।

उस इन्द्र की यक्ष मे भक्ति जानकर स्री-वेशधारिणी उमारूपा ब्रह्मविद्या देवी प्रकट हुईं । वह इन्द्र उस अत्यन्त शोभामयी हैमबती उमा के पास गया ।

“समस्त शोभायमानो मे विद्या ही सबसे अधिक शोभामयी है; इसलिए उसके लिये “बहु शोभमाना” यह विशेषण उचित ही है। हैमबती अर्थात्‌ हेम ( सुवर्ण ) निर्मित आंभूषणो वाली के समान अत्यन्त शोभामयी । अथवा हिमवान्‌ की कन्या होने से उमा (पार्वती) ही हैमवती है। वह सदा उस सर्वज्ञ ईश्वर के साथ वर्तमान रहती है; अतः उसे जानने में समर्थ होगी। ” यह सोचकर इन्द्र उसके पास गया, और उससे पूछा–“बतलाइये, इस प्रकार दर्शन देकर छिप जाने वाला यक्ष कौन है?

तब उमादेवी ने इन्द्र से कहा कि “यह बद्म है” क्युकी निस्सन्देह तुम ईश्वर की विजय मे ही तुम महिमा को प्राप्त हुए हो, असुरों को ईश्वर ने ही जीता था, तुम तो उसमे निमित्तमात्र थे ।अतः उसकी ही बिजय मे तुम्हे यह महिमा मिली है। लेकिन “यह हमारी ही विजय है, यह हमारी ही महिमा है!” ऐसा सोचना भी तुम्हारा मिथ्या अमिमान ही है।

तब उमा देवी के उस वाक्य से ही इन्द्र ने जाना कि यह ब्रह्म है! अर्थात्‌ उमा देवी के वाक्य से ही इन्द्र ने ब्रह्म को जाना, स्वयं नहीं।

चूँकि अन्य देवता अग्नि और वायु ब्रह्म के समीप अवश्य गए थे, लेकिन उसके बारे में जान न सके। लेकिन इंद्र को ब्रह्म का ज्ञान सबसे पहले हुआ इसलिए इन्द्र सभी देवताओं में श्रेष्ठ हुए, उसके बाद अग्नि और वायु श्रेष्ठ हुए। क्युकी वायु और अग्नि ने भी इन्द्र से जाना कि यह ब्रह्म है।


स्रोत – केनोपनिषद (गीता प्रेस द्वारा 1992 में प्रकाशित संस्करण) और इंटरनेट पर पब्लिक डोमेन में उपलब्ध जानकारियों के माध्यम से।

डिस्क्लेमर – शब्दों में हेर फेर या अर्थ में भिन्नता या त्रुटि हो सकती है, इसलिए व्रह्मविद्या द्वारा बताया गया ब्रह्मतत्व के बारे में गीता प्रेस द्वारा प्रकाशित केनोपनिषद या अपने गुरु द्वारा ही समझे ।


FAQs (केनोपनिषद प्रश्नोत्तरी) –

Who is Yaksha according to Kenopanishad?

According to Kenopanishad, Yaksha-form was Brahma who appeared for the protection of gods.

केनोपनिषद के अनुसार यक्ष कौन है?

केनोपनिषद के अनुसार यक्ष स्वरूप ब्रह्मा है, जो देवताओं के अभिमान के खंडन के लिए प्रकट हुए ।

केनोपनिषद में प्रतिपादित विषय का संक्षिप्त विवेचन करें?

केनोपनिषद उपनिषद चार खण्डों में विभाजित है। प्रथम व द्वितीय खंड में- गुरु और शिष्य वार्तालाप के द्वारा ब्रह्म सत्ता के बारे में बताया गया है।
तीसरे और चौथे खंड में- देवताओं में अभिमान व देवी ऊमा हेमवती (व्रह्मविद्या) के द्वारा “ब्रह्म तत्व’ ज्ञान का उल्लेख है।

 

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