तृष्णा किसे कहते है? योगवशिष्ठ

श्रीरामचन्द्रजी कहते हैं – मुनीश्वर ! चेतन जीवरूपी आकाश में हृदय के अज्ञानान्धकार से परिपूर्ण दुस्तर तृष्णारूपिणी रात्रि का सहारा पाकर नाना प्रकार के दोषरूपी उल्लुओं के समूह क्रियाशील हो उठते हैं।

जैसे रात में ओस के कणों से अभिषिक्त तथा आस-पास के उपवनों में खिले हुए काञ्चन पुष्प (धतूरे के फूल) की उज्ज्वल शोभा से सुशोभित चने की फलियाँ निश्चय ही अधिक विकास को प्राप्त होती हैं, उसी प्रकार अनेक तरह के दुःखमय विलापों से प्रकट हुए अश्रुविन्दुओं से आर्द्र तथा निकटवर्ती सुवर्ण आदि की अभिलाषा द्वारा उज्ज्वल हुई चिन्ता या तृष्णा अवश्य अधिकाधिक बढ़ने लगती है।

जैसे समुद्र के भीतर भँवर एवं हलचल उत्पन्न करने के लिये ही तरङ्गे उठा करती हैं, उसी तरह हृदय को चञ्चल बना देने वाली तृष्णा अन्तःकरण में भ्रम एवं आकुलता पैदा करने के लिये ही उस सीमा तक आ पहुँचती है, जहाँ वह धनादि की प्राप्ति के लिये कष्टप्रद उत्साह को बढ़ावा देती है। यद्यपि तृष्णा के वेग को रोकने के लिये यह चित्तरूपी चातक नाना प्रकार की चेष्टाएँ करता है, तथापि जैसे आँधी सड़े-गले तिनके को न जाने कहाँ-से-कहाँ उड़ा ले जाती है, उसी प्रकार कलङ्किनी तृष्णा ने इसे न जाने कहाँ- किस अयोग्य अवस्था में पहुँचा दिया।

जैसे जाल में फँसे हुए पक्षी अपने घोंसले में जाने की शक्ति से वञ्चित हो वहीं शोक-दुःख से मोहित हो जाते हैं, वैसे ही हम लोग चिन्ता या तृष्णा के जाल में फँसकर अपने पारमार्थिक स्वरूप को प्राप्त करने में असमर्थ हो मोह में डूबे रहते हैं।

तृष्णा एक पागल घोड़ी के समान है, जो यहाँ से दूर-दूर जाकर बारम्बार लौट आती और फिर तुरंत ही सम्पूर्ण दिशाओं में चक्कर काटने लगती है। जैसे घटीयन्त्र (रहट) के ऊपर लगी हुई रस्सी घट के साथ सदा ऊपर-नीचे आती रहती है, जड या जल से सम्बन्ध
रखती है, अपने भीतर गाँठें रखती है एवं चञ्चल बनी रहती है, उसी तरह यह तृष्णा धर्म और अधर्म के अनुसार सदा स्वर्ग तथा नरक में गमनागमन कराती,चेतन और जड़की ग्रन्थिसे जुड़ी रहती, जड पदार्थों से सम्बन्ध रखती और सदा विक्षुब्ध बनी रहती है। जो देह के भीतर मन में गुँथी हुई है, जिसका छेदन करना प्रायः सभी के लिये अत्यन्त कठिन है, उस तृष्णा के द्वारा मनुष्य उसी प्रकार शीघ्र भारवाही बना लिया जाता है

जैसे रास की रस्सी बैल को तत्काल भार ढोनेके लिये विवश कर देती है। जैसे बहेलिये की स्त्री पक्षियों को फँसाने के लिये जाल बनाती है, उसी प्रकार सदा आकर्षण शील स्वभाव वाली तृष्णा लोगों को फँसाने के लिये स्त्री, पुत्र और मित्र आदि की परम्परा रचती रहती है। यद्यपि मैं धीर हूँ, तथापि भयानक काली रात के समान तृष्णा मुझे भयभीत-सा कर देती है। विवेक रूपी नेत्र से सम्पन्न हूँ तो भी वह मुझे अंधा-सा बना देती है और सच्चिदानन्दघन रूप होने पर भी मुझे वह मानो खेद में डाल देती है।

तृष्णा को काली नागिन के समान समझना चाहिये। वह सहस्रों कुटिलताओं से भरी हुई है। विषयभोग-सुख ही उसका कोमल स्पर्श है। वह विषमतारूपी विष को ही उगलती है और तनिक-सा स्पर्श हो जाने पर भी हँस लेती है (अपने सम्पर्क में आये हुए प्राणी का नाश कर
देती है)। इतना ही नहीं, तृष्णा काली-कलूटी राक्षसी के समान भी बतायी गयी है। वह पुरुषों के हृदय का भेदन करने वाली तथा मायामय जगत्‌ को रचनेवाली है। दुर्भाग्य प्रदान करने वाली तथा दीनता की प्रतिमूर्ति है। पर्वत की गुफा में एक प्रकार की लता होती है, जो सूर्य किरणों के न मिलने से सदा अत्यन्त मलिन रहती है। वह खाने में कड़वी और परिणाम में उन्माद का रोग पैदा करने वाली है। उसकी बेल बहुत लंबी होती है और उसमें रस की मात्रा अधिक रहती है। यह तृष्णा भी उसी लता के समान निरन्तर अत्यन्त मलिन, परिणाम में दुःख से पागल बना देनेवाली, वासना रूपी विशाल ताँतों से युक्त तथा विषयों में गहरा स्नेह पैदा करने वाली है।

जैसे ऊँचे वृक्षों की शाखा के अग्रभाग में स्थित सूखी हुई मञ्जरी पुष्पशून्य, निष्फल तथा कण्टकाकीर्ण होने के कारण आनन्ददायिनी नहीं होती, उसी प्रकार तृष्णा सर्वथा सूनी, निष्फल, व्यर्थ विस्तार को प्राप्त होनेवाली, अमङ्गलकारिणी और क्रूर है। यह कभी सुखदायिनी नहीं होती। संसाररूपी विशाल वन में तृष्णारूपिणी विष की बेल फैली हुई है। जरा-मृत्यु आदि ही इसके फूल तथा विनिपात और उत्पात (अधःपतन और उपद्रव) ही फल हैं।

मुने ! चिन्ता (तृष्णा) चञ्चल मोरनी के समान है। मोरनी वर्षा की बूँदें पड़ने पर बारम्बार नृत्य करती है, शरद्-ऋतु का प्रकाश आ जाने पर शान्त हो जाती है और दुर्गम स्थानों में भी पैर रखती है, इसी तरह तृष्णा भी कुहरे के समान मोह के आवरण में स्फुरित होती है- नाच उठती है, विवेक का प्रकाश छा जाने पर शान्त हो जाती है और असाध्य वस्तुओं में भी पाँव रख देती है। केवल वर्षा-काल में इतराकर बहने वाली छोटी नदी और तृष्णा में बहुत कुछ समानता है। वह नदी वर्षा के अतिरिक्त समय में चिरकाल तक जलशून्य पड़ी रहती है। वर्षा-ऋतुमें भी बीच-बीच में जब वृष्टि रुक जाती है, वह जल से खाली हो जाती है; परंतु पानी बरसने पर उसमें क्षणभर में बाढ़ आ जाती है और जल की बहुत-सी उत्ताल तरङ्गे उठने लगती हैं। इसी प्रकार तृष्णा भी चिरकाल तक फल शून्य ही रहती है, कभी-कभी सफल होने पर भी बीच-बीच में फलशून्य हो जाती है। जड पदार्थों में ही इसे अधिक आनन्द मिलता है और क्षण भर में ही यह उल्लसित हो उठती है।

चारे के लोभ से चञ्चल हुई चिड़िया जैसे फलशून्य खड़े हुए वृक्ष को छोड़कर दूसरे-दूसरे फलयुक्त वृक्षपर चली जाती है, उसी प्रकार तृष्णा भी विवेकी एवं विरक्त पुरुष को छोड़कर विषयासक्त पुरुष के पास चली जाती है। तृष्णा और चञ्चल बँदरिया दोनों का स्वभाव एक-जैसा है। वे अलङ्ग्य स्थान में भी पैर रख देती हैं, तृप्त हो जाने पर भी नये-नये फल की इच्छा करती हैं और विषय रूप एक स्थान पर अधिक काल तक नहीं ठहरतीं।

तृष्णा हृदयरूपी कमल में निवास करने वाली भ्रमरी है। यह क्षण भर में पाताल को चली जाती है, फिर दूसरे ही क्षण आकाश की सैर करने लगती है और क्षण भर में ही दिगन्तरूपी निकुञ्ज में मड़राती दिखायी देती है। संसार में जितने दोष हैं, उन सबमें एकमात्र तृष्णा ही ऐसी है, जो दीर्घकाल तक दुःख देती रहती है। वह अन्तः पुर में रहने वाले मनुष्य को भी भीषण संकट में डाल देती है। तृष्णारूपिणी मेघमाला मोहरूपी नीहार-पुञ्ज से घनीभूत होकर परम ज्ञान रूपी सूर्य के प्रकाश को ढक देती है और जगत्‌ को केवल जडता (जल अथवा अज्ञान) ही प्रदान करती है।

तृष्णा सांसारिक व्यवहार में फँसे हुए समस्त प्राणियों को बाँधने के लिये एक मजबूत रस्सी के समान है। उसने सब के मन को बाँध रखा है। इन्द्र-धनुष जिन लक्षणों अथवा धर्मो से युक्त दिखायी देता है; वे ही तृष्णा के लक्षण अथवा धर्म हैं। वह इन्द्र-धनुष की ही भाँति बहुरंगी, गुणहीन,विशाल, मलिन (मेघ अथवा अशुद्ध अन्तःकरण वाले प्राणीके) आधार पर स्थित, शून्य रूप और शून्य में ही पैर रखने वाली है।

तृष्णा गुणरूपी हरी-भरी खेती को नष्ट करने के लिये वज्रपात के समान है। आपत्तियों को बढ़ाने के लिये उस शरद् ऋतु के तुल्य है, जिसके आने पर धान आदि की खेती पकी हुई बालों से सम्पन्न हो जाती है। तत्त्व-ज्ञानरूपी कमलों का विध्वंस करने के लिये ओले के सदृश और अज्ञानरूपी अन्धकार की वृद्धि के लिये वह हेमन्त की लंबी रात के समान है।

तृष्णा इस संसाररूपी नाटक की नटी है, प्रवृत्तिरूप नीडमें निवास करने वाली पक्षिणी है, मनोरथ रूपी महान् वन में विचरनेवाली हरिणी है और काम रूपी संगीत को उद्बुद्ध करने वाली वीणा है। वह व्यवहार रूपी समुद्र की लहर है। मोहरूपी मत वाले गजराज को बाँधे रखने के लिये साँकल है, सृष्टि रूपी वटवृक्ष की सुन्दर वरोह है और दुःखरूपी कुमुदों को विकसित करने वाली चाँदनी है।

इतना ही नहीं, तृष्णा जरा-मृत्युरूप दुःखमय रत्नों का संग्रह करने के लिये एकमात्र रत्न-पेटिका है तथा आधि-व्याधिरूप विलासों का नित्य विस्तार करने वाली मदमत्त विलासिनी है। तृष्णा को व्योमवीथी (आकाश) के समान समझना चाहिये। जैसे आकाश कभी सूर्य के प्रकाश से निर्मल हो जाता है, कभी मेघों की घटा घिर आने से वहाँ कुछ क्षणों के लिये कुछ-कुछ अँधेरा छा जाता है और कभी वह कुहरेसे ढक जाता है, उसी प्रकार तृष्णा भी कभी किंचित् विवेक का प्रकाश पाकर निर्मल हो जाती है, विवेक न होने पर अज्ञान से मलिन रहती है तथा कभी कुहरे के समान मोह से आवृत हो जाती है। जब तक विष-विशेष के उद्भव से प्रकट होने वाले विषूचिका (हैजा) नामक रोग के समान मृत्यु की हेतुभूता तृष्णा पीछे लगी रहती है, तभी तक यह चञ्चल-चित्त मूढ़ जन-समुदाय मोह को प्राप्त होता रहता है।

लोग विषयों का चिन्तन त्याग देने से ही अपने सम्पूर्ण दुःख को दूर कर सकते हैं। विषय-चिन्तन का त्याग ही तृष्णारूपिणी विषूचिका के निवारण का मन्त्र कहा गया है।

तृष्णा वेणुलता (बाँस) बतायी जाती है। जैसे बाँस भीतरसे खोखला, बीच-बीच में गाँठों से युक्त और कोंपल रूपी बड़े-बड़े काँटों से भरा होता है तथा उसमें सबको प्रिय लगने वाले मोती उपलब्ध होते हैं, उसी प्रकार तृष्णा भी भीतर से खोखली, कपट-दुराग्रह आदि गाँठों से भरी, चिन्ता और दुःखरूपी कण्टकों से परिपूर्ण तथा मोती-मणि आदि धन-सम्पत्ति में अधिक प्रेम रखने वाली है। फिर भी यह बड़े आश्वर्यकी बात है कि परम बुद्धिमान् ज्ञानीजन विवेक की चमचमाती हुई तलवार से उस दुश्छेद्य चिन्ता को भी काट डालते हैं।

ब्रह्मन् ! जीवों के हृदय में रहने वाली यह तृष्णा जैसी तीखी है, वैसी तीखी न तो तलवार की धार है न वज्राग्नि की लपटें हैं और न आग में तपाये हुए लोहकणों की चिनगारियाँ ही हैं। तृष्णा दीप-शिखा के समान कही गयी है।

जैसे दीपक की शिखा बीच में उज्ज्वल, अन्त में काली होती है, उसका अग्रभाग तीखा होता है, उसमें तेल और लंबी-सी बत्ती रहती है, वह प्रकाशमान होती है, और दाहके कारण उसका स्पर्श दुस्सह होता है, उसी प्रकार तृष्णा भी बीच में भोग-वैभव से उज्ज्वल और अन्त में दुःख एवं मृत्यु देने वाली होने के कारण काली होती है, उसका अग्रभाग या आरम्भ भी असह्य होता है। वह स्त्री-पुत्र आदि के स्नेह से पूर्ण तथा बाल्य, यौवन, बुढ़ापा नामक अवस्था-विशेष रूपी बत्तियों से युक्त होती है, इसका सबको प्रत्यक्ष अनुभव होता है तथा इष्ट वस्तु के वियोग जनित अन्तर्दाह उत्पन्न करने के कारण यह सबके लिये असह्य हो उठती है।

महर्षे ! मेरुपर्वत के समान परम उन्नत, विद्वान्, शूरवीर, सुस्थिर और श्रेष्ठ मनुष्य को भी यह एकमात्र तृष्णा ही पलभर में याचक बनाकर तिनके के समान हलका कर देती है।


स्रोत – संक्षिप्त योगवशिष्ठ, वैराग्य प्रकरण – तृष्णा की निंदा – (सर्ग १७)
दंडवत आभार – श्रीगीताप्रेस गोरखपुर द्वारा प्रकाशित संक्षिप्त योगवशिष्ठ, पेज संख्या – २३


 

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