हरे राम हरे कृष्ण महामंत्र का स्रोत क्या है?

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अगर आप जानना चाहते है कि इस्कॉन परम्परा के लोग और श्रील प्रभुपाद को अपना गुरु मानने वाले सिर्फ “हरे राम, हरे कृष्ण” ही क्यों बोलते है, उसे मन्त्र क्यों बताते है?, क्या वह वास्तव में मंत्र है?

हालाँकि इसके बारे में इस्कॉन के सभी प्रभु (Devotees) भी बताते रहते है, कई न्यूज़ और मीडिया वेबसाइट के लेखो ने भी बताया है, लेकिन यहाँ आपको सम्पूर्ण स्रोत को बताकर उसको बता रहे है ताकि आपका विस्वास सम्पूर्ण रूप से दृढ़ हो जाए। क्युकी अधूरी जानकारी बताकर, विधर्मी हमें भ्रमित करते रहते है। उस अधूरे ज्ञान से सावधान रहे। अन्य स्रोत भी होंगे, हमें ज्ञान होने पर यहाँ अपडेट करेंगे।

अब आप यहाँ से इस कलिसन्तरणोपनिषद का हिंदी अनुवाद ध्यान से पढ़िए –

शान्तिपाठ –

॥ हरि: ॐ ॥

ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु ।
सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ।

परमात्मा हम दोनों गुरु शिष्यों का साथ साथ पालन करे। हमारी रक्षा करें। हम साथ साथ अपने विद्याबल का वर्धन करें। हमारा अध्ययन किया हुआ ज्ञान तेजस्वी हो। हम दोनों कभी परस्पर द्वेष न करें।

ऊँ शान्तिः शान्तिः शान्ति: ॥

हमारे, अधिभौतिक, अधिदैविक तथा तथा आध्यात्मिक तापों (दुखों) की शांति हो।

द्वापर युग के अन्तिम काल में एक बार देवर्षि नारद पितामह ब्रह्माजी के समक्ष उपस्थित हुए और बोले’हे भगवन्‌ ! मैं पृथ्वी लोक में भ्रमण करता हुआ किस प्रकार से कलिकाल से मुक्ति पाने में समर्थ हो सकता हूँ?

ब्रह्माजी प्रसन्नमुख हो इस प्रकार बोले – हे वत्स! तुमने आज मुझसे अत्यन्त प्रिय बात पूछी है। आज मैं समस्त श्रुतियों का जो अत्यन्त गुप्त रहस्य है, उसे बतलाता हूँ, सुनो। इसके श्रवण मात्र से ही कलियुग में संसार सागर को पार कर लोगे । भगवान्‌ आदिपुरुष श्रीनारायण के पवित्र नाम के उच्चारण मात्र से मनुष्य कलिकाल के समस्त दोषों को विनष्ट कर डालता है।

देवर्षि नारद ने पुन: प्रश्न किया – पितामह! वह कौन सा नाम है?

तदुपरान्त हिरण्यगर्भ ब्रह्मा जी ने कहा – वह सोलह अक्षरों से युक्त नाम इस प्रकार है-

हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे ।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।

इस प्रकार ये सोलह नाम कलिकाल के महान्‌ पापों का विनाश करने में सक्षम हैं। इससे श्रेष्ठ अन्य कोई दूसरा उपाय चारों वेदों में भी दृष्टिगोचर नहीं होती। इन सोलह नामों के द्वारा षोडश कलाओं से आवृत जीव के आवरण समाप्त हो जाते हैं। तदनन्तर जिस प्रकार मेघ के विलीन होने पर सूरज की किरणें ज्योतित होने लगती हैं, वैसे
ही परब्रह्म का स्वरूप भी दीप्तिमान्‌ होने लगता है॥ २॥

देवर्षि नारद जी ने पुनः प्रश्न किया – हे प्रभु! इस मन्त्र नाम के जप की क्या विधि है?

ब्रह्माजी ने कहा – इस मन्त्र की कोई विधि नहीं है। शुद्ध हो अथवा अशुद्ध, हर स्थिति में इस मन्त्र-नाम का सतत जप-करने वाला मनुष्य सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य एवं सायुज्य आदि सभी तरह की मुक्ति को प्राप्त कर लेता है। जब साधक इस षोडश नाम वाले मन्त्र का साढ़े तीन करोड़ जप कर लेता है, तब वह ब्रह्म-हत्या के दोष से मुक्त हो जाता है। वह बीरहत्या (या भाई की हत्या) के पाप से भी मुक्त हो जाता है। स्वर्ण की चोरी के पाप से भी मुक्त हो जाता है। पितर, देव और मनुष्यों के अपकार के पापों (दोषों) से भी मुक्त हो जाता है। समस्त धर्मों के त्याग के पाप से वह तुरन्त ही परिशुद्ध हो जाता है। वह शीघ्रातिशीघ्र मोक्ष को प्राप्त कर लेता है।

ऐसा यह कलिसन्तरणोपनिषद उपनिषद्‌ है॥ ३ ॥

शान्तिपाठ –

ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु ।
सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ।

परमात्मा हम दोनों गुरु शिष्यों का साथ साथ पालन करे। हमारी रक्षा करें। हम साथ साथ अपने विद्याबल का वर्धन करें। हमारा अध्ययन किया हुआ ज्ञान तेजस्वी हो। हम दोनों कभी परस्पर द्वेष न करें।

ऊँ शान्तिः शान्तिः शान्ति: ॥

हमारे, अधिभौतिक, अधिदैविक तथा तथा आध्यात्मिक तापों (दुखों) की शांति हो।

॥ हरि: ॐ ॥

 

FAQs –

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे हरे हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे हरे कौन सा मंत्र है?

यह शास्त्र प्रमाणित मंत्र है, जिसकी जानकारी आपको कलिसन्तरणोपनिषद में मिलती है।

मंत्र में पहले हरे कृष्णा या पहले हरे राम आता है?

कलिसन्तरणोपनिषद के अनुसार, मंत्र का सही रूप इस प्रकार है –

हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे हरे कृष्णा हरे कृष्णा कृष्णा कृष्णा हरे हरे

लेकिन हरे कृष्ण महामंत्र इस्कॉन में तो पहले हरे कृष्णा आता है?

यह हो सकता है कि इस्कॉन संस्था का गुरु प्रदत्त मंत्र हो, अर्थात उनके गुरु भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद के द्वारा प्रदान किया गया मंत्र हो। कभी कभी एक गुरु किसी मंत्र को अपने ज्ञान और विवेक से बदलाव अपने अनुभव के अनुसार करता है, लेकिन सभी गुरु ऐसा कर सकते है, यह आवश्यक नहीं है। यह निर्भर करता है उसकी निस्वार्थ जप तप व्रत की भक्ति की शकित पर।

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