संत और असंत का मर्म क्या है?
पक्षीराज गरुड़जी फिर प्रेम सहित बोले- हे कृपालु! यदि मुझ पर आपका प्रेम है, तो हे नाथ! मुझे अपना सेवक…
पक्षीराज गरुड़जी फिर प्रेम सहित बोले- हे कृपालु! यदि मुझ पर आपका प्रेम है, तो हे नाथ! मुझे अपना सेवक…
तुलसीदासजी कहते हैं – इस कलिकाल में योग, यज्ञ, जप, तप, व्रत और पूजन आदि कोई दूसरा साधन नहीं है।…
काकभुशुण्डि जी गरुड़ जी से कहते हैं कि – जो आपने मुझ से शुकदेवजी, सनकादि और शिवजी के मन को…
आषाढ़ मास की कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी का माहात्म्य जानने के बाद युधिष्ठिर ने पूछा – भगवन् ! आषाढ़…